युग का स्वर और कलम का योद्धा कालजयी कवि प्रदीप : शब्दों में रची देशभक्ति की अमर गाथा। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख ।



इतिहास के पन्नों पर कुछ नाम ऐसे अंकित हो जाते हैं जो काल की सीमाओं को लांघकर अमरता प्राप्त कर लेते हैं। आधुनिक हिंदी साहित्य और भारतीय सिनेमा के आकाश में 'कवि प्रदीप' एक ऐसे ही दैदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी लेखनी ने केवल गीत नहीं लिखे, बल्कि सोए हुए राष्ट्र की चेतना को झकझोरा। आज 'मीमांसा' के इस विशेष जयंती अंक में हम उस महान विभूति को नमन कर रहे हैं, जिन्होंने 'ऐ मेरे वतन के लोगों' जैसे कालजयी गीतों से करोड़ों आँखों को नम किया और 'चल-चल रे नौजवान' से क्रांति की मशाल जलाई।

6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के उज्जैन की पावन धरा पर 'रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी' के रूप में जन्मे इस बालक को शायद स्वयं विधाता ने भारतीय मानस की वेदना और विजय को शब्द देने के लिए चुना था।
इलाहाबाद की साहित्यिक तपस्या और 'प्रदीप' का उदय
रामचंद्र द्विवेदी की प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई, किंतु उनके व्यक्तित्व का असली निखार इलाहाबाद (प्रयागराज) की साहित्यिक गलियों में हुआ। वह दौर साहित्य का स्वर्ण काल था। दारागंज के उस वातावरण में, जहाँ महादेवी वर्मा, निराला और बच्चन जैसे दिग्गज बसते थे, युवा रामचंद्र की काव्य-प्रतिभा पल्लवित हुई।
एक ऐतिहासिक गोष्ठी में, जिसकी अध्यक्षता राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन कर रहे थे, बीस वर्षीय इस युवक ने जब अपना सुरीला काव्य-पाठ किया, तो समूचा सदन मंत्रमुग्ध रह गया। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' जी ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए 'माधुरी' पत्रिका में लिखा था कि प्रदीप की 'दीपक रागिनी' ने कोयल और पपीहे के स्वर को भी पीछे छोड़ दिया है। निराला जी के आशीर्वाद से ही रामचंद्र 'प्रदीप' बने, और आगे चलकर डाक की अव्यवस्था से बचने के लिए उन्होंने स्वयं को 'कवि प्रदीप' के रूप में स्थापित किया।

सिनेमा की दुनिया में क्रांति का पदार्पण

1939 में जब कवि प्रदीप मुंबई पहुँचे, तो बॉम्बे टॉकीज के हिमांशु राय उनकी प्रतिभा के कायल हो गए। फिल्म 'कंगन' से शुरू हुआ उनका सफर 'बंधन' और 'किस्मत' तक पहुँचते-पहुँचते एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया।

"दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है"

फिल्म 'किस्मत' (1943) का यह गीत कोई साधारण फिल्मी गाना नहीं था; यह ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला देने वाली ललकार थी। इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह था कि सिनेमाघरों में इसे बार-बार दिखाने की माँग होती थी। तत्कालीन अंग्रेज सरकार इतनी भयभीत हुई कि कवि प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया गया और उन्हें कुछ समय के लिए भूमिगत होना पड़ा। उनकी कलम ने सिद्ध कर दिया कि एक कवि की स्याही किसी भी बारूद से अधिक शक्तिशाली होती है।

स्वतंत्रता संग्राम और गाॅंधीवादी विचारधारा

कवि प्रदीप केवल एक गीतकार नहीं, बल्कि गाॅंधीवादी जीवन-मूल्यों के सच्चे संवाहक थे। उन्होंने धन-दौलत को कभी सादगी पर हावी नहीं होने दिया। उनका मानना था कि आपसी ईर्ष्या और द्वेष ही हमारी गुलामी का कारण बने। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वह शारीरिक रूप से भी सक्रिय रहे, यहाँ तक कि एक आंदोलन में उनका पैर भी फ्रैक्चर हो गया।
शहीद चंद्रशेखर आजाद की शहादत पर उनकी व्याकुलता उनके गीतों में झलकती है। उन्होंने लिखा था "वह इस घर का एक दिया था..."। उनकी रचनाओं में देश के प्रति समर्पण और समाज के वंचितों के प्रति करुणा कूट-कूट कर भरी थी। पंडित नेहरू ने स्वयं स्वीकार किया था कि उनकी पुत्री इंदिरा गांधी बचपन में 'वानर सेना' की परेड प्रदीप जी के गीत 'चल-चल रे नौजवान' पर ही कराती थीं।

ऐ मेरे वतन के लोगों : एक अमर श्रद्धांजलि

भारतीय संगीत और देशभक्ति के इतिहास में 26 जनवरी 1963 का दिन स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद जब देश हताशा में डूबा था, तब कवि प्रदीप ने दिल्ली के रामलीला मैदान में लता मंगेशकर के स्वर के माध्यम से वह गीत पेश किया जिसने समूचे राष्ट्र के घावों पर मरहम लगा दिया।

गीत की रचना का रोचक प्रसंग:

कहा जाता है कि इस गीत की पंक्तियाँ प्रदीप जी के मानस पटल पर तब उभरीं जब वे मुंबई के माहिम बीच पर टहल रहे थे। पास में कोई कागज न होने पर उन्होंने एक सिगरेट के पैकेट के खाली हिस्से पर वे अमर बोल लिख लिए "जरा आँख में भर लो पानी"।
जब लता जी ने इसे गाया, तो प्रधानमंत्री नेहरू की आँखें भर आईं। बाद में जब नेहरू जी ने प्रदीप जी से मुलाकात की, तो उन्होंने बड़े सादे शब्दों में कहा "यह गीत मेरे हृदय की वेदना का प्रतीक है।" आज भी यह गीत भारतीय सेना और आम नागरिक के लिए एक पवित्र मंत्र की तरह है।

भक्ति, समाज और मानवता का संगम

कवि प्रदीप की लेखनी केवल सीमाओं तक सीमित नहीं थी। उन्होंने समाज की बदलती फितरत पर भी करारी चोट की। फिल्म 'नास्तिक' का वह कालजयी गीत:
 "देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान।"

आज भी उतना ही प्रासंगिक है। वहीं, 'जय संतोषी माँ' जैसी फिल्म के माध्यम से उन्होंने भक्ति की एक ऐसी लहर पैदा की कि फिल्म ने इतिहास रच दिया। 'मैं तो आरती उतारूँ रे संतोषी माता की' जैसे भजनों ने उन्हें घर-घर का हिस्सा बना दिया।
उनकी लेखनी की शक्ति का लोहा तो पड़ोसी देश पाकिस्तान ने भी माना। 'जागृति' फिल्म के उनके गीतों की लोकप्रियता इतनी अधिक थी कि पाकिस्तान ने उनकी हूबहू नकल कर 'बेदारी' फिल्म बनाई। यह उनके शब्दों का वैश्विक प्रभाव ही था कि वे सीमाओं को पार कर गए।

व्यक्तित्व: सादगी और सिद्धांत

कवि प्रदीप एक ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने कभी अपनी आत्मा का सौदा नहीं किया। जब बॉम्बे टॉकीज में राजनीति बढ़ी, तो उन्होंने उसे त्याग दिया, भले ही उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। 'मिस कमल बी.ए.' जैसे छद्म नाम से लिखना पड़ा, लेकिन अपनी कलम को कुंठित नहीं होने दिया।

उनकी पुत्री मितुल के शब्दों में, उनकी माँगें बहुत छोटी थीं स्वादिष्ट दाल-चावल, समय पर अखबार और बीबीसी हिंदी सेवा के समाचार। वे एक ऐसे सरल व्यक्तित्व थे जो मजरूह सुल्तानपुरी जैसे साथियों के उपहास पर भी सिर्फ मुस्कुरा देते थे।

पुरस्कार और अंतिम विदाई

कवि प्रदीप को 1961 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1995 में 'राष्ट्रकवि' की उपाधि और 1998 में सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' से नवाजा गया। जब वे व्हीलचेयर पर पुरस्कार लेने पहुँचे, तो पूरा हॉल उनके सम्मान में खड़ा हो गया था।
11 सितंबर 1998 को 83 वर्ष की आयु में इस महान साधक ने अंतिम सांस ली। यद्यपि उनके पार्थिव शरीर को अग्नि ने आत्मसात कर लिया, लेकिन उनके लिखे 1700 गीत आज भी भारतीय हवाओं में गूँजते हैं।
उपसंहार: वह दीपक जो कभी नहीं बुझता
आज जब हम आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं, तब कवि प्रदीप के गीत हमें हमारे इतिहास, हमारे बलिदान और हमारी मानवीयता की याद दिलाते हैं। वे केवल एक फिल्मी गीतकार नहीं थे, वे एक आधुनिक ऋषि थे जिन्होंने 'शब्द' की साधना से राष्ट्र का निर्माण किया।
'मीमांसा' की ओर से हम इस राष्ट्रकवि को शत-शत नमन करते हैं। उनकी पंक्तियाँ हमेशा हमारा मार्गदर्शन करती रहेंगी:
 "इंसान का इंसान से हो भाईचारा, यही पैगाम हमारा।"

अस्वीकरण (Disclaimer)

इस जयंती विशेषांक का उद्देश्य कवि प्रदीप के जीवन, उनके साहित्यिक योगदान और भारतीय सिनेमा में उनके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करना है। यह लेख पूर्णतः शैक्षिक, सूचनात्मक और श्रद्धांजलि स्वरूप है।
तथ्यात्मक सटीकता: आलेख में प्रस्तुत जानकारी विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों, साक्षात्कारों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। हालांकि लेख की शुद्धता सुनिश्चित करने का हरसंभव प्रयास किया गया है, फिर भी 'मीमांसा' किसी भी अनजाने में हुई तथ्यात्मक त्रुटि के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी नहीं होगी।
विचार: लेख में व्यक्त विचार कवि प्रदीप के जीवन दर्शन और तत्कालीन परिस्थितियों का विश्लेषण करते हैं। इसका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, समुदाय या संगठन की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

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