कलम और बारूद का महासंगम: क्रांति-द्रष्टा मन्मथनाथ गुप्त। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा' । संपादकीय आलेख
इतिहास की कोख से कुछ ऐसे व्यक्तित्व जन्म लेते हैं, जो केवल समय को देखते नहीं, बल्कि उसे अपनी वैचारिक ऊर्जा से मोड़ देने का साहस रखते हैं। मन्मथनाथ गुप्त एक ऐसा ही देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनके जीवन का आधा हिस्सा कालकोठरियों की लोहे की सलाखों के पीछे बीता, तो शेष आधा हिस्सा शब्दों की उन साधनाओं में, जिन्होंने भारतीय जनमानस को वैचारिक दासता से मुक्त किया। आज के इस विशेषांक में हमारा उद्देश्य केवल एक क्रांतिकारी का स्मरण करना नहीं है, बल्कि उस 'कलमकार' की शिनाख्त करना है जिसने पिस्तौल की गर्जना और शब्दों की मौन गूँज के बीच एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया। 13 वर्ष की उम्र में जेल जाने वाले उस किशोर से लेकर 'आजकल' पत्रिका के प्रबुद्ध संपादक तक की यात्रा, संघर्ष और सृजन के उस महासंगम की गाथा है, जिसे आज की पीढ़ी के समक्ष रखना हमारा नैतिक दायित्व है।
प्रस्तुत आलेख मन्मथ जी के उन अनछुए पहलुओं को स्पर्श करता है, जहाँ वे एक ओर काकोरी के रणबाँकुरे हैं, तो दूसरी ओर मनोविश्लेषण और प्रगतिवाद के गंभीर अध्येता। आइए, 'मीमांसा' के इस अंक के माध्यम से हम उस 'सव्यसाची' रचनाकार के कृतित्व में गोता लगाएँ, जिसके लिए राष्ट्र-प्रेम कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन की अंतिम सांस तक निभाया गया एक पवित्र अनुष्ठान था।मन्मथनाथ गुप्त जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित यह संपादकीय आलेख, उनके क्रांतिकारी साहस और साहित्यिक ओज को नमन करने का एक विनम्र प्रयास है।
इतिहास के पन्नों से एक अमर स्वर
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल रक्त और बलिदान की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन प्रखर मस्तिष्क और संवेदनशील हृदयों की भी कहानी है जिन्होंने विचारों की सान पर आजादी की धार तेज की। आज 'मीमांसा' के इस विशेष अंक में हम एक ऐसे ही 'कलम के सिपाही' और 'क्रांति के अग्रदूत' मन्मथनाथ गुप्त को याद कर रहे हैं, जिनकी उंगलियों ने पिस्तौल के ट्रिगर और लेखनी के सामर्थ्य, दोनों को समान अधिकार से थामा।7 फरवरी 1908 को काशी की पुण्यधरा पर जन्मा यह बालक आगे चलकर भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का जीवंत दस्तावेज बन गया।
किशोरावस्था और क्रांति का उद्घोष
मन्मथनाथ गुप्त का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि राष्ट्रभक्ति उम्र की मोहताज नहीं होती। मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में, जब बच्चे खेल-खिलाड़ियों की दुनिया में मग्न होते हैं, मन्मथ जी ने विदेशी दासता की बेड़ियों को काटने का संकल्प ले लिया था। किशोरावस्था में ही वे भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य से प्रेरित हो गए थे, और 1921 में, महज 13 वर्ष की आयु में, उन्हें वाराणसी में प्रिंस एडवर्ड के स्वागत समारोह के बहिष्कार का आह्वान करने वाले पर्चे बांटने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। तीन महीने की कैद ने उनके संकल्प को और भी मजबूत कर दिया। काशी विद्यापीठ के संस्कारों ने उनके भीतर राष्ट्रवाद के जो बीज बोए, वे जल्द ही 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन' (HRA) के सक्रिय सदस्य के रूप में पल्लवित हुए।
काकोरी कांड: एक अग्नि-परीक्षा
सन् 9 अगस्त 1925 का काकोरी कांड भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना थी। 17 वर्षीय मन्मथ उस टोली के अभिन्न अंग थे जिसमें रामप्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खाँ और चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे महारथी शामिल थे। एक अनपेक्षित दुर्घटना जिसमें उनकी असावधानी से एक रेल यात्री की मृत्यु हुई ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। जहाँ उनके वरिष्ठ साथियों को फाँसी का फंदा मिला, वहीं आयु कम होने के कारण मन्मथ जी को 14 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। जेल की उन कालकोठरियों ने उनके भीतर के क्रांतिकारी को और भी अधिक परिपक्व और वैचारिक बनाया।
साहित्य: विचारों का विस्फोट
मन्मथनाथ गुप्त केवल एक सेनानी नहीं थे, वे एक सिद्धहस्त रचनाकार थे जिनके पास तीन भाषाओं (हिन्दी, अंग्रेजी और बांग्ला) का असाधारण भंडार था। 1937 में जेल से रिहाई के बाद उन्होंने अपनी लेखनी को ही अपना अस्त्र बना लिया।
इतिहास लेखन: उन्होंने 'भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास' लिखकर उन गुमनाम नायकों को न्याय दिलाया जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास ने हाशिए पर डाल दिया था।
संस्मरण: उनकी पुस्तक 'क्रान्तियुग के संस्मरण' केवल यादें नहीं, बल्कि उस दौर की धड़कती हुई सच्चाई है।
उपन्यास और गल्प: 'बहता पानी' जैसे उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने क्रांतिकारी चरित्रों के मानवीय पक्षों, उनके द्वंद्वों और उनकी जिजीविषा को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेरा।
मन्मथ जी की जो पुस्तकें चर्चा में रहीं उनके नाम इस प्रकार हैं
1.They Lived Dangerously - Reminiscences of a Revolutionary (मूलतः अंग्रेजी में 1969 का संस्करण)
2.भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास (संशोधित संस्करण : 1993)
3.History of the Indian Revolutionary Movement (उपरोक्त पुस्तक के 1972 वाले संस्करण का अविकल अंग्रेजी अनुवाद)
4.Gandhi and His Times (1982)
5.Bhagat Singh and His Times (मूलतः अंग्रेजी में)
6.आधी रात के अतिथि
7.कांग्रेस के सौ वर्ष
8.दिन दहाड़े
9.सर पर कफन बाँध कर
10.तोड़म फोड़म
11.अपने समय का सूर्य : दिनकर
12.शहादतनामा
13.मनोविश्लेषण में रुचि
वैचारिक विस्तार और मनोविश्लेषण
मन्मथ जी का साहित्य केवल नारों तक सीमित नहीं था। वे प्रेमचंद के बाद के उन गंभीर समीक्षकों में से थे जिन्होंने मार्क्सवाद और मनोविश्लेषण के सिद्धांतों को भारतीय संदर्भों में परखा। 'कथाकार प्रेमचंद' और 'प्रगतिवाद की रूपरेखा' जैसी कृतियाँ उनके गहरे बौद्धिक चिंतन को दर्शाती हैं। विशेष रूप से 'सेक्स का प्रभाव' जैसी कृति लिखकर उन्होंने उस समय के रूढ़िवादी समाज में एक साहसी विमर्श की शुरुआत की।
स्वतंत्र भारत में संपादकीय दायित्व
आजादी के बाद भी मन्मथ जी थमे नहीं। उन्होंने 'योजना', 'बाल भारती' और 'आजकल' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन कर भारतीय पत्रकारिता के स्तर को नई ऊंचाइयां दीं। उनके संपादन में एक अनुशासन था और नई पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने की एक तड़प थी।
एक युग का अवसान: बुझ गया दीप
26 अक्टूबर 2000 दीपावली का दिन जब पूरा देश रोशनी के उत्सव में सराबोर था, भारत की क्रांति का वह 'जीवन-दीप' शांत हो गया। उन्होंने दिल्ली के निजामुद्दीन ईस्ट स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। विडंबना देखिए, जिस व्यक्ति ने ताउम्र मशालें जलाईं, उसने विदा लेने के लिए दीपों के पर्व को ही चुना।
निष्कर्ष: उनकी विरासत और हमारा कर्तव्य
मन्मथनाथ गुप्त का जीवन हमें सिखाता है कि 'क्रांति' केवल व्यवस्था परिवर्तन का नाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर आत्म-परिष्कार और बौद्धिक जागरण की प्रक्रिया है। उन्होंने एक बार विज्ञान भवन में कहा था कि "साहित्यकार की संसद में विस्फोट होना चाहिए" उनका तात्पर्य विचारों के उस धमाके से था जो सोए हुए समाज को जगा सके।
आज 'मीमांसा' के माध्यम से हम उस महान मनीषी को केवल याद नहीं कर रहे, बल्कि उनके उन अधूरे संकल्पों को दोहरा रहे हैं जहाँ कलम अन्याय के विरुद्ध बारूद बनने का साहस रखती हो। मन्मथ जी का संपूर्ण जीवन एक 'शहादतनामा' है, जो हमें याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता की रक्षा केवल सीमा पर खड़े सैनिक ही नहीं, बल्कि मेज पर रखी कलम भी करती है।
नमन उस महानायक को, जिसकी स्याही में राष्ट्र का रक्त बोलता था।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह आलेख ऐतिहासिक तथ्यों, उपलब्ध दस्तावेज़ों, संस्मरणों, प्रकाशित पुस्तकों तथा लेखक के वैचारिक अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया एक संपादकीय प्रस्तुतीकरण है। इसका उद्देश्य मन्मथनाथ गुप्त के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं क्रांतिकारी-साहित्यिक योगदान का परिचय देना और पाठकों में ऐतिहासिक चेतना एवं बौद्धिक संवाद को प्रोत्साहित करना है।
लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी अध्ययन एवं विश्लेषण पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था, संगठन या विचारधारा की अवमानना, राजनीतिक प्रचार अथवा विवाद उत्पन्न करना नहीं है। ऐतिहासिक घटनाओं के विवरण में समय, संदर्भ या स्रोतगत भिन्नताओं के कारण तथ्यात्मक अंतर संभव है, जिसके लिए संपादक/प्रकाशक उत्तरदायी नहीं होंगे।
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