इंक़लाब और रूमानी तसव्वुर का शायर: फ़ैज़ अहमद फ़ैज़। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।


आज 13 फ़रवरी है। हवाओं में एक खास किस्म की खनक है और अदब की दुनिया में एक अनोखी गूंज। आज उस अज़ीम शख़्सियत का जन्मदिन है, जिसने शायरी को सिर्फ़ महबूब की ज़ुल्फ़ों के साये से निकालकर सलाखों के पीछे की सच्चाई और अवाम के दर्द से रूबरू कराया। हम बात कर रहे हैं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की एक ऐसा शायर जिसके लिए 'इश्क़' और 'इंक़लाब' दो अलग-अलग रास्ते नहीं, बल्कि एक ही मंज़िल के दो नाम थे। अपनी रचनाएं नक्श-ए-फरयादी, दस्त-ए-सबा तथा ज़िन्दान नामा के कारण वे साहित्य प्रेमियों के हृदय , बुक सेल्फ और देशभर के विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं।

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस जयंती विशेषांक में, आइए हम उस कलम के जादूगर को याद करें, जिसकी नज़्में आज भी सरहदों के पार न्याय और मोहब्बत की मशाल जलाए हुए हैं।

सियालकोट की मिट्टी और ज़हन का विस्तार

फ़ैज़ का जन्म 1911 में सियालकोट (अविभाजित भारत) में हुआ था। उनकी परवरिश एक ऐसे माहौल में हुई जहाँ अरबी, फ़ारसी और उर्दू के साथ-साथ अंग्रेज़ी अदब की तालीम का भी गहरा असर था। उन्होंने एम.ए. अंग्रेज़ी और अरबी में किया, जो उनके लेखन में दिखने वाले गहरे दार्शनिक और वैश्विक दृष्टिकोण का आधार बना।
पर क्या आप जानते हैं कि एक रूमानी सा दिखने वाला यह नौजवान मार्क्सवादी विचारधारा की ओर कैसे मुड़ा? दरअसल, वह दौर वैश्विक आर्थिक मंदी का था। फ़ैज़ ने अपनी आँखों से गरीबी, कर्ज़ और आम आदमी की बेबसी देखी। इसी दर्द ने उन्हें 'प्रगतिवादी लेखक संघ' (Progressive Writers' Movement) की बुनियाद रखने वालों में शामिल कर दिया।

"मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग"

अदब की दुनिया में फ़ैज़ की यह नज़्म एक 'टर्निंग पॉइंट' मानी जाती है। इसमें वे अपने महबूब से कहते हैं कि दुनिया में और भी बहुत से गम हैं जो मोहब्बत से ज़्यादा संगीन हैं:

"मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग...
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा।"

यहाँ फ़ैज़ ने रोमांस को नकारा नहीं, बल्कि उसे सामाजिक ज़िम्मेदारी के साथ जोड़ दिया। उन्होंने सिखाया कि जब तक समाज में ज़ुल्म है, तब तक महबूब की आँखों में खोए रहना एक तरह की खुदग़र्ज़ी है।

जीवन और पेशा 

उनका परिवार एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार था । उनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू, अरबी तथा फ़ारसी में हुई जिसमें क़ुरान को कंठस्थ करना भी शामिल था। उसके बाद उन्होंने स्कॉटिश मिशन स्कूल तथा लाहौर विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। उन्होंने अंग्रेजी 1933 तथा अरबी 1935में एम॰ए॰ किया। अपने कामकाजी जीवन की शुरुआत में वो एमएओ कालेज, अमृतसर में लेक्चरर बने। उसके बाद मार्क्सवादी विचारधाराओं से बहुत प्रभावित हुए (इसी दौरान पिता की मौत हो गई, और वैश्विक आर्थिक मन्दी छा गई जिससे उनपर कर्ज़ बढ़ गया) । "प्रगतिवादी लेखक संघ" से 1936 में जुड़े और उसके पंजाब शाखा की स्थापना सज्जाद ज़हीर के साथ मिलकर की जो उस समय के मार्क्सवादी नेता थे। 1938 से 1946 तक उर्दू साहित्यिक मासिक अदब-ए-लतीफ़ का संपादन किया।

सन् 1941 में उन्होंने अपने छंदो का पहला संकलन नक़्श-ए-फ़रियादी नाम से प्रकाशित किया। एक अंग्रेज़ समाजवादी महिला एलिस जॉर्ज से शादी की और दिल्ली में आ बसे। ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और कर्नल के पद तक पहुँचे। विभाजन के वक़्त पद से इस्तीफ़ा देकर लाहौर वापिस गए। वहाँ जाकर इमरोज़ और पाकिस्तान टाइम्स का संपादन किया। 1942 से लेकर 1947 तक वे सेना में थे। लियाकत अली ख़ाँ की सरकार के तख़्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में वे 1951 - 1955 तक कैद में रहे। इसके बाद 1962 तक वे लाहोर में पाकिस्तानी कला परिषद् में रहे। 1963 में उन्होंने योरोप, अल्जीरिया तथा मध्यपूर्व का भ्रमण किया और तत्पश्चात 1964 में पाकिस्तान वापस लौटे। वो 1958 में स्थापित एशिया-अफ़्रीका लेखक संघ के स्थापक सदस्यों में से एक थे। भारत के साथ 1965 के पाकिस्तान से युद्ध के समय वे वहाँ के सूचना मंत्रालय में कार्यरत थे।

1978 में एशियाई-अफ़्रीकी लेखक संघ के प्रकाशन अध्यक्ष बने और 1982 तक बेरुत (लेबनॉन) में कार्यरत रहे। 1982 में वापस लाहौर लौटे और 1984 में उनका देहांत हुआ। उनका आखिरी संग्रह "ग़ुबार-ए-अय्याम" (दिनों की गर्द) मरणोपरांत प्रकाशित हुई।

सलाखों के पीछे से गूंजती आवाज़: ज़िन्दान-नामा

फ़ैज़ का जीवन फूलों की सेज नहीं था। वे एक कर्नल रहे, पत्रकार रहे, और फिर पाकिस्तान की सियासत में उन्हें 'रावलपिंडी साजिश केस' के नाम पर सलाखों के पीछे डाल दिया गया। पर क्या बेड़ियाँ किसी शायर की सोच को कैद कर सकती हैं? बिल्कुल नहीं।
जेल के अंधेरे कमरों में उन्होंने 'ज़िन्दान-नामा' जैसी कालजयी कृतियाँ रचीं। उनकी नज़्म 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे' आज भी दुनिया भर में अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे बड़ा तराना है।

जब वे कहते हैं 'बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बाँ अब तक तेरी है' तो वे केवल शब्द नहीं लिख रहे होते, बल्कि वे हर उस इंसान को हिम्मत दे रहे होते हैं जिसकी आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है।

फ़ैज़: सरहदों से परे एक वैश्विक पहचान

फ़ैज़ केवल पाकिस्तान या भारत के शायर नहीं थे। उनकी ख्याति वैश्विक थी। वे लेनिन शांति पुरस्कार से नवाज़े गए और नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित हुए। उनकी शायरी ने वियतनाम से लेकर फिलिस्तीन तक के दबे-कुचले लोगों को साहस दिया।

उनकी कलम की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि वे इंक़लाब की बात भी बड़ी मृदु और नज़ाकत भरी शैली में करते थे। वे लहू का ज़िक्र करते हुए भी उसे 'गुलों के रंग' जैसा खूबसूरत बना देते थे।

फिल्म जगत और लोक-संस्कृति में फ़ैज़

फ़ैज़ की मकबूलियत सिर्फ किताबों तक मौजूद नहीं रही। उनकी ग़ज़लें और नज़्में भारतीय और पाकिस्तानी फिल्मों का अटूट हिस्सा बनीं। उनकी रचना "गुलों में रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले" को मेहदी हसन ने जिस शिद्दत से गाया, उसने फ़ैज़ को हर घर की आवाज़ बना दिया।
उनके गीतों में जो सादगी और गहराव था, वह आज के दौर के शोर-शराबे वाले संगीत के बीच एक सुकून देने वाली राहत की तरह है। वे पटकथा लेखक के तौर पर भी उतने ही प्रभावशाली थे, जहाँ उन्होंने अपनी कहानियों के ज़रिए समाज के निचले तबके को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया।

आज के दौर में फ़ैज़ की प्रासंगिकता
आज जब दुनिया वैचारिक मतभेदों, युद्ध और नफरत की आग में झुलस रही है, फ़ैज़ की यादें एक ठंडी फुहार जैसी हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि:

इंसानियत सबसे ऊपर है: उनके लिए मज़हब या मुल्क की सरहदें उतनी बड़ी नहीं थीं जितना कि इंसान का दुख।
सच्चाई का साहस: चाहे जेल जाना पड़े या निर्वासन (Exile) झेलना पड़े, उन्होंने अपनी वैचारिक निष्ठा से समझौता नहीं किया।
उम्मीद का दामन: उनकी शायरी कभी भी निराशा में खत्म नहीं होती। वे हमेशा 'सुब्ह-ए-आज़ादी' की उम्मीद जगाते हैं।

उपसंहार

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो हमें प्यार करना भी सिखाती है और अन्याय के खिलाफ लड़ना भी। 'मीमांसा' के इस अंक के माध्यम से हम उन्हें नमन करते हैं। वे चले गए, पर उनके ये शब्द हमेशा ज़िंदा रहेंगे:

"निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन, कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले"

फ़ैज़ को याद करना, असल में अपनी इंसानियत को याद करना है। आज उनके जन्मदिन पर आइए संकल्प लें कि हम भी अपने 'लब्ज़ों' को आज़ाद रखेंगे और 'ज़ुल्म की छाँव' में भी तड़पने के बजाय मुस्कुराने का हौसला रखेंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण)

यह आलेख प्रख्यात शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की जयंती के अवसर पर उनके जीवन, साहित्य और योगदान को याद करने के उद्देश्य से लिखा गया है। आलेख में दी गई जानकारी ऐतिहासिक तथ्यों, विकिपीडिया स्रोतों और साहित्यिक संदर्भों पर आधारित है।

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