अनाथ विमर्श


"हिंदी साहित्य में अनाथ विमर्श का प्रतिमान: अस्मिता विस्थापन और वैकल्पिक सामाजिकता, प्रेमचंद के हामिद और प्रसाद के मधुआ के विशेष संदर्भ में।"

अमन कुमार होली 
शोधार्थी, हिंदी विभाग, विश्व भारती शांतिनिकेतन 
 
संक्षेपिका (Abstract):
प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य हिंदी साहित्य के समकालीन विमर्शों के मध्य अनाथ विमर्श की आवश्यकता और सार्थकता को रेखांकित करना है। हिंदी साहित्य में अस्मितामूलक  विमर्श पब्लिक डिसकोर्स का हिस्सा स्वातंत्र्योत्तर विचार संक्रांति और सामाजिक आवश्यकता के कारण बने हैं। साहित्य में अब तक स्त्री, दलित, आदिवासी, किन्नर तथा दिव्यांगता पर व्यापक कार्य हुआ है। किंतु अनाथ बचपन की मनोवैज्ञानिक जटिलताओं, सामाजिक बहिष्कार और उसके अस्तित्वगत संघर्ष को एक स्वतंत्र विमर्श के रूप में पर्याप्त स्थान नहीं मिला है। प्रस्तुत शोध-पत्र समकालीन आलोचनात्मक विमर्शों के परिदृश्य में अनाथ विमर्श (ऑरफेन डिसकोर्स) की सैद्धांतिक नींव रखने का एक मौलिक प्रयास है। साहित्यिक और सामाजिक गलियारों में अनाथ की स्थिति को सदैव करूणा परक दृष्टिकोण से देखा गया, उसे एक स्वायत्त सामाजिक राजनीतिक श्रेणी के रूप में विश्लेषित नहीं किया गया। यह शोध विषय प्रेमचंद की ईदगाह और जयशंकर प्रसाद की मधुआ कहानियों के माध्यम से अनाथ बचपन के मनो-सामाजिक विन्यास और संस्थागत उपेक्षा का अध्ययन करता है। शोध का उद्देश्य अनाथ पात्रों को वस्तु (object) के स्थान पर विषय (subject) के रूप में पुनर्स्थापित करना है।



बीज शब्द (Keywords): अनाथ-विमर्श, अस्मितामूलक विमर्श, वैकल्पिक सामाजिकता, वैकल्पिक परिवार, कुल-हीनता, हामिद, मधुआ, संज्ञानात्मक विकास।

प्रस्तावना (Preface): 
साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं बल्कि समाज के अदृश्य कोनों को अवलोकित करने वाली मशाल भी है। आधुनिक हिंदी आलोचना में विमर्श का अर्थ हाशिए की आवाज को केंद्र में लाना रहा है। भारतीय समाज जो कुल, जाति और वंश की श्रेष्ठता पर टिका है वहाॅं उस व्यक्ति की स्थिति कहाॅं ठहरती है, जिसके पास अपनी जड़ों का कोई प्रमाण नहीं है? अनाथ वही इकाई है, जिसे समाज बेचारा कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। वह अपने जन्म के साथ ही पारिवारिक व सामाजिक संरचना से बाहर कर दिया गया है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो वास्तव में स्वतंत्र और व्यवस्थित रूप में हाशिए के विमर्श में स्थान की आवश्यकता पर दवा रखता है। साहित्य में अनाथ पात्र अक्सर सहानुभूति या कहानी को मोड़ देने के लिए टूल मात्र बनकर रह जाते हैं। प्रेमचंद की ईदगाह और जयशंकर प्रसाद की मधुआ कहानियों में मौजूद अनाथ पात्रों मधुआ और हामिद के जरिए उसके व्यक्तिगत अस्तित्व, अभावों में परिपक्व को बचपन, निजी त्रासदी, भूख, अनाथ होने के कारण सामाजिक उपेक्षा, आर्थिक अभाव और आश्रित जीवन शैली व बाल मन पर उठती मनोवैज्ञानिक दशा की अभिव्यक्ति को साहित्यिक विमर्श का केंद्र बिंदु बनाना है। संस्कृत साहित्य से लेकर प्रेमचंद प्रसाद युग और उत्तर समकालीन दौर तक अनाथों का जिक्र हमारे साहित्य और सिनेमा का अनिवार्य हिस्सा रहा है लेकिन यहाॅं अनाथ पत्र गौण हो जा रहे हैं। विश्व मानव की अवधारणा और मानवीय संवेदनशीलता के आलोक में मधुआ और हामिद के अनाथत्व के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। साहित्यिक गलियारों में जिसे बाल मनोविज्ञान या बाल साहित्य के संकीर्ण दायरे से बाहर अब तक नहीं देखा गया है। 


1. भारतीय साहित्य में हजारों वर्षों से अनाथत्व एक अंतर्धारा के रूप में मौजूद रहा है, लेकिन इसे कभी एक स्वतंत्र वैचारिक विमर्श के रूप में संहिताबद्ध नहीं किया गया है। ये साहित्य में चित्रित अनाथ पात्र केवल माता-पिता विहीन बालक नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक नियति और दैवीय विधान के बीच संघर्षरत मनुष्यता के प्रतीक हैं। हामिद का अनाथ बचपन प्रौढता का विमर्श है एक बच्चा जो खिलौना नहीं खरीदता क्योंकि वह अपनी दादी के जलते हाॅंथों को महसूस करता है। यह अनाथत्व का त्यागमय चेहरा है, मधुआ अनाथत्व का अंधेरा पक्ष है जहाॅं बच्चा सामंती शोषण की चक्की में पिस रहा है।

हामिद अभावों का प्रौढ़ मनोवैज्ञानिक दृष्टि 

हामिद की एकमात्र सहारा उसकी वयोवृद्धा दादी अमीना है। जो बहुत कष्टों में रहकर भी अपने पोते को ईदगाह के लिए तैयार करती है एवं खाने पीने के लिए कुल तीन पैसे सौंपती है। कहानी के अन्य पात्र जो हामिद के हम उम्र हैं वे व्यवहारिक तौर पर हामिद जितने बड़े नहीं हुए। मोहसिन, महमूद, सम्मी और नूरे आदि बच्चों के स्वाभाविक बाल मनोविज्ञान, खेलकूद और उल्लास तैर रहा है। उन पात्रों में प्रौढ़ता का आवरण नहीं चढ़ा है उनका बचपन सामान्य है। शिक्षा स्वास्थ्य और खेल उनकी बुनियादी जरुरत पूर्ण हो जाती है।

हामिद का पात्र यह सिद्ध करता है कि अनाथ बच्चा अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं एक सुरक्षा चक्र विकसित करता है। हामिद द्वारा चिमटा खरीदना उसकी संज्ञानात्मक परिपक्वता को दर्शाता है वह अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं का दमन करके एक सामूहिक सुरक्षा दादी के प्रति उत्तरदायित्व को चुनता है।अनाथ विमर्श के दृष्टिकोण से हामिद अपनी कुल हीनता को नैतिक श्रेष्ठता में बदल देता है। यद्यपि बालसुलभ लालसा हामिद के मुॅंह में भी पानी ला देता है प्रेमचंद लिखते हैं :
"खिलौने के बाद मिठाईयाॅं आती है। किसी ने रेवड़ियाॅं ली हैं, किसी ने गुलाब-जामुन किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहें हैं। हामिद उनकी बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई ऑंखों से सबकी ओर देखता है।"1

हामिद का अनाथपन उसे उसकी उम्र से पहले वयस्क बना देता है। जहाॅं अन्य बच्चे खिलौने और मिठाईयों में खोए हैं, उसे अपनी दादी की अंगुलियों के जलने की चिंता सताती है। उसके अंदर का उत्तरदायित्व उसके कोमल बचपन पर हावी है। प्रेमचंद ने पूरी स्थिति को जीवंत बना दिया है, जिसमें सर्वत्र तर्कशीलता और उपादेयता हीं दिखती है। प्रेमचंद बताते हैं :
"मिठाईयों के बाद कुछ दुकानें लोहे की चीजों की, कुछ गिलट और नक़ली गहनों की। लड़कों के लिए यहाॅं कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं हामिद लोहे की दुकान पर रूक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थें। उसे ख़्याल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है तवे से रोटियां उतारती है तो हाॅंथ जल जाता है। अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितना प्रसन्न होंगी। फिर उनकी अंगुलियाॅं कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी।"2

प्रेमचंद हामिद जैसे अनाथ बालक के पास कल्पना रूपी धन और समझदारी का पुरस्कार सौंपते हैं।वह अपने माता-पिता के आने की झूठी आशा में भी स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। यहाॅं अनाथत्व आत्म सम्मान और संयम का विमर्श बनकर उभरता है। प्रेमचंद ने हामिद की उस मन: स्थिति और आशा को इस प्रकार शब्दों में पिरोया है : 
"अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है। उसके अब्बा जान रुपए कमाने गए हैं। बहुत सी थैलियाॅं लेकर आऍंगे।
अम्मीजान अल्ला मियाॅं के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं; इसलिए हामिद प्रसन्न है। आशा तो बड़ी चीज़ है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है।"3


हामिद के अंदर वस्तुनिष्ठता  और बड़ों की सी सूझ-बूझ बहुत ही आसानी से देखी जा सकती है प्रेमचंद ने हामिद को अनाथ दिखाकर ही उसकी परिपक्वता (Maturity) को उभारा है।
एक सामान्य बच्चा जिसके माता-पिता होते हैं, वह मेले में खिलौने और मिठाइयों की जिद करता है।
हामिद अनाथ होने और गरीबी के कारण वक्त से पहले समझदार हो गया है। उसे पता है कि घर में पैसे कम हैं और दादी के हाथ रोटियां सेंकते समय जल जाते हैं।
निष्कर्ष: दादी अमीना उसका सहारा हैं, लेकिन वे उसके माता-पिता का विकल्प नहीं बल्कि उनकी कमी को पूरा करने की कोशिश कर रही हैं। हामिद का चिमटा खरीदना उसकी उसी "अनाथ" स्थिति से उपजी जिम्मेदारी का प्रतीक है।


निष्कर्ष: 
बाल विमर्श सामान्य बचपन की बात करता है (शिक्षा, खेल, स्वास्थ्य)। लेकिन 'अनाथ विमर्श' उस बचपन की बात करता है जिसके पास 'नाम' और 'जड़ें' ही नहीं हैं। एक अनाथ बच्चा बड़ा होकर भी अनाथ ही रहता है (जैसे कर्ण)। इसलिए यह उम्र तक सीमित नहीं है, यह एक 'जीवन भर की सामाजिक स्थिति' (Life-long Social Status) है। अनाथत्व केवल माता-पिता की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह उस 'सामाजिक नागरिकता' का अभाव है जो व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देती है। जयशंकर प्रसाद का 'मधुआ' जब शराबी के साथ निकलता है, तो वह एक नई 'सामाजिक संधि' (Social Contract) कर रहा होता है। यह विमर्श 'रक्त की शुद्धता' पर आधारित भारतीय समाज को 'संवेदना की शुद्धता' पर आधारित होने का संदेश देता है। यदि साहित्य हाशिए के समाज का स्वर है, तो 'अनाथ' उस हाशिए का भी अंतिम बिंदु है, जिसे अब तक मुख्यधारा की आलोचना ने अपनी सुविधा के लिए अनदेखा किया है।"

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