कृष्णा सोबती — शब्दों के आलोक में एक जीवंत महागाथा। जयंती विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।


आज हिंदी साहित्य के आकाश में उस नक्षत्र का स्मरण करने का दिन है, जिसने अपनी चमक से न केवल पन्नों को बल्कि पाठकों की चेतना को भी आलोकित किया। कृष्णा सोबती (18 फरवरी 1925 – 25 जनवरी 2019) केवल एक लेखिका नहीं, बल्कि एक संस्था थीं। गुजरात (अब पाकिस्तान) की मिट्टी में जन्मी और विभाजन की त्रासदी को अपनी स्मृतियों में समेटे कृष्णा जी ने जब लिखना शुरू किया, तो उन्होंने हिंदी कथा-साहित्य को एक ऐसी 'खुरदरी' और 'प्रांजल' भाषा दी, जो उससे पहले नदारद थी।

साहित्यिक कर्म: बेबाकी और शिल्प का संगम

कृष्णा सोबती का लेखन किसी तयशुदा ढांचे में नहीं बँधता। उनकी रचनाओं में 'मित्रो मरजानी' (1967) ने भारतीय समाज में स्त्री की देह और उसकी आकांक्षाओं को जिस बेबाकी से स्वर दिया, उसने तत्कालीन रूढ़िवादी समाज की चूलें हिला दीं। 'मित्रो' हिंदी साहित्य की सबसे जीवंत और विवादास्पद पात्रों में से एक है, जो अपनी इच्छाओं के लिए किसी पुरुष या समाज की मोहताज नहीं है।

उनका उपन्यास 'ज़िन्दगीनामा' (1979) इतिहास और संस्कृति का एक ऐसा दस्तावेज़ है, जिसमें पंजाब की साझा संस्कृति, लोकगीत और विभाजन पूर्व के सद्भाव की खुशबू रची-बसी है। उन्होंने 'ऐ लड़की', 'डार से बिछुड़ी' और 'दिलोदानिश' जैसी कृतियों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं के पेचीदा सत्यों को उजागर किया।


कहानी संग्रह

बादलों के घेरे - 1980
लम्बी कहानी (आख्यायिका/उपन्यासिका)-
डार से बिछुड़ी -1958
मित्रो मरजानी -1967
यारों के यार -1968
ऐ लड़की -1991
सिक्का बदल गया
मेरी माँ कहा है
जैनी मेहरबान सिंह -2007 (चल-चित्रीय पटकथा; 'मित्रो मरजानी' की रचना के बाद ही रचित, परन्तु चार दशक बाद 2007 में प्रकाशित)

उपन्यास
सूरजमुखी अँधेरे के -1972
ज़िन्दगी़नामा -1979
दिलोदानिश -1993
समय सरगम -2000
गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान -2017 (निजी जीवन को स्पर्श करती औपन्यासिक रचना)

विचार-संवाद-संस्मरण
हम हशमत (तीन भागों में)
सोबती एक सोहबत
शब्दों के आलोक में
सोबती वैद संवाद
मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में -2017
लेखक का जनतंत्र -2018
मार्फ़त दिल्ली -2018

यात्रा-आख्यान
बुद्ध का कमण्डल : लद्दाख़


जीवन दर्शन: 'हम हशमत' का द्वैत

कृष्णा जी के व्यक्तित्व का एक अद्भुत पहलू उनका 'छद्म नाम' हशमत था। उन्होंने 'हम हशमत' शीर्षक से संस्मरणों की एक श्रृंखला लिखी। हशमत उनके भीतर का वह पुरुष था जो अपनी समकालीन लेखिका 'कृष्णा सोबती' को एक निष्पक्ष दूरी से देखता था। यह प्रयोग उनके भीतर की रचनात्मक ईमानदारी और स्वयं को चुनौती देने की क्षमता को दर्शाता है। वे मानती थीं कि लेखक को अपनी निजता और सार्वजनिक छवि के बीच एक संतुलन बनाकर रखना चाहिए।

सम्मान और पुरस्कार 

कृष्णा सोबती ने पुरस्कारों से अधिक साहित्य की गरिमा को महत्व दिया। उन्हें मिले प्रमुख सम्मानों की सूची लंबी है:
साहित्य अकादमी पुरस्कार (1980): 'ज़िन्दगीनामा' के लिए।
ज्ञानपीठ पुरस्कार (2017): भारतीय साहित्य का सर्वोच्च सम्मान।
शलाका सम्मान: हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा।
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने एक बार पद्म भूषण स्वीकार करने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि एक लेखक के रूप में उनकी स्वतंत्रता किसी भी राजकीय सम्मान से ऊपर है। यह उनके व्यक्तित्व की अडिगता और नैतिक बल का प्रमाण था।

उनके साहित्य का पुनर्पाठ क्यों ज़रूरी है?

आज के दौर में जब भाषा और विमर्श अक्सर सतही होते जा रहे हैं, कृष्णा सोबती के साहित्य की ओर लौटना एक 'सांस्कृतिक ज़रूरत' है। उनके पुनर्पाठ की आवश्यकता निम्नलिखित कारणों से और भी बढ़ जाती है:

क) भाषाई संस्कार और ताज़गी

कृष्णा सोबती ने हिंदी को संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली और थोपी गई उर्दू से मुक्त कर एक ऐसी 'मिश्रित' भाषा दी, जो सीधे दिल से निकलती थी। उन्होंने बोलियों के शब्दों को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। आज जब हम हाइब्रिड भाषा के दौर में हैं, उनके शब्द-संस्कार हमें भाषा की गहराई समझाते हैं।

ख) स्त्री विमर्श की मौलिक जड़ें

आज का स्त्री विमर्श अक्सर पश्चिमी सिद्धांतों पर आधारित होता है, लेकिन कृष्णा सोबती की स्त्रियाँ (जैसे मित्रो या ऐ लड़की की माँ) नितांत देसी हैं। वे अपनी जड़ों से जुड़ी हैं और वहीं से अपनी मुक्ति का रास्ता खोजती हैं। उनका साहित्य सिखाता है कि स्त्री की आज़ादी केवल बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और देह पर अपने अधिकार को पहचानने में है।

ग) इतिहास और स्मृतियों का संरक्षण

उनका अंतिम उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' केवल एक आत्मकथात्मक कृति नहीं है, बल्कि वह उस पीड़ा का साक्ष्य है जिसे एक पीढ़ी ने विभाजन के दौरान सहा। आज के ध्रुवीकृत समय में, उनकी रचनाएँ हमें उस 'साझी विरासत' की याद दिलाती हैं जिसे हमने सरहदों के बीच खो दिया।

घ) निर्भयता और प्रतिरोध का स्वर

कृष्णा जी ने कभी सत्ता या बाज़ार के सामने समझौता नहीं किया। उनका लेखन सत्ता के खिलाफ एक शांत लेकिन दृढ़ प्रतिरोध है। वर्तमान लेखकों और पाठकों के लिए उनका जीवन यह सीखने का अवसर है कि कैसे एक रचनाकार अपनी शर्तों पर जी सकता है और अपनी कलम की धार को कुंद होने से बचा सकता है।

उपसंहार

कृष्णा सोबती आज हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द आज भी अपनी 'अमलतास' सी चमक बिखेर रहे हैं। वे कहती थीं, "समय सरगम है, जिसे हर लेखक को अपने ढंग से बजाना होता है।" उन्होंने अपनी सरगम इतनी बखूबी बजाई कि उसकी प्रतिध्वनि सदियों तक सुनाई देगी।
'मीमांसा' की ओर से हिंदी की इस कालजयी लेखिका को उनकी जन्म जयंती पर शत-शत नमन।

अस्वीकरण (Disclaimer)

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के जयंती विशेषांक में यह आलेख केवल साहित्यिक चर्चा और कृष्णा सोबती की जन्म जयंती पर श्रद्धांजलि स्वरूप प्रकाशित है। इसमें प्रस्तुत तथ्य उपलब्ध ऐतिहासिक और साहित्यिक स्रोतों पर आधारित हैं। लेखक के विचार लेखिका के प्रति एक विशेष विश्लेषण हैं, जिसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

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