डॉ॰ नामवर सिंह: हिन्दी आलोचना के 'शिखर पुरुष' और वैचारिक संवाद के सेतु। पुण्यतिथि विशेषांक। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। संपादकीय आलेख।



हिन्दी आलोचना के आकाश में जब हम एक ऐसे व्यक्तित्व की खोज करते हैं जिसने न केवल साहित्य को पढ़ा, बल्कि उसे एक नई दृष्टि और जीवंत भाषा दी, तो डॉ. नामवर सिंह का नाम अनायास ही हमारे होंठों पर थिरकने लगता है। वे केवल एक नाम नहीं, बल्कि हिन्दी साहित्य के उस स्वर्णिम अध्याय के हस्ताक्षर हैं, जहाँ आलोचना केवल व्याख्या न रहकर एक सृजनात्मक कर्म बन गई।
वाराणसी की मिट्टी से उपजे और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसी महान विभूति के सान्निध्य में गढ़े गए नामवर जी ने अपने गुरु की सांस्कृतिक विरासत को न केवल सहेजा, बल्कि उसे 'दूसरी परम्परा की खोज' के माध्यम से एक नई पहचान दी। गुरु-शिष्य की वह अनूठी जुगलबंदी, जहाँ एक ओर आचार्य द्विवेदी का गंभीर सांस्कृतिक बोध था, तो दूसरी ओर नामवर जी की प्रखर और तार्किक मेधा, जिसने हिन्दी शोध और समालोचना को नए आयाम प्रदान किए।

उनकी कृतियाँ चाहे वह 'छायावाद' की सूक्ष्म व्याख्या हो, 'कविता के नए प्रतिमान' के जरिए आधुनिक काव्यबोध को समझने की बेचैनी, या 'वाद-विवाद-संवाद' की वह जीवंत शैली साहित्यिक विमर्श के केंद्र में सदैव बनी रहीं। वे जितने सशक्त लेखक थे, उतने ही मंत्रमुग्ध कर देने वाले वक्ता भी। जब वे बोलते थे, तो मानों शब्द स्वयं अपना अर्थ खोजने लगते थे।
आज उनकी पुण्यतिथि के इस विशेष अवसर पर, 'मीमांसा' पत्रिका का यह अंक उनके इसी विराट व्यक्तित्व और उस आलोचनात्मक विवेक को समर्पित है, जिसने हिन्दी जगत को 'नामवर' बनाया। आइए, इस पुण्यतिथि विशेषांक के माध्यम से हम उस शिखर पुरुष के अवदान का पुनः स्मरण करें और उनके वैचारिक संवाद की कड़ियों को जोड़ते हुए साहित्य की इस गौरवशाली यात्रा में सहभागी बनें।


व्यक्तित्व: एक 'नामवर' परंपरा का विस्तार

28 जुलाई 1926 को वाराणसी (अब चंदौली) के जीयनपुर गाँव में जन्मे नामवर सिंह केवल एक आलोचक नहीं थे; वे एक संस्था थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्य होने के नाते उन्हें 'पांडित्य' और 'लोक' के समन्वय की विरासत मिली थी। उनका व्यक्तित्व 'वाद-विवाद-संवाद' की जीवंत पाठशाला था। वे जितने गहरे अध्येता थे, उतने ही प्रभावशाली वक्ता भी। उनकी वाणी में वह जादू था कि कठिन से कठिन सिद्धांत भी श्रोताओं के लिए सुगम हो जाते थे। जे॰एन॰यू॰ के गलियारों से लेकर साहित्य अकादमी के मंचों तक, नामवर जी की उपस्थिति मात्र से विमर्श का स्तर ऊँचा हो जाता था। उनका निधन 19 फरवरी 2019 को नयी दिल्ली में हुआ।

आलोचना की 'दूसरी परंपरा' और वैचारिक अवदान

नामवर सिंह ने हिन्दी आलोचना को उस समय एक नई पहचान दी जब वह पुराने प्रतिमानों में जकड़ी हुई थी। उनकी प्रमुख कृतियाँ हिन्दी साहित्य के मील के पत्थर हैं:
कविता के नये प्रतिमान: इस कृति के लिए उन्हें 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसमें उन्होंने मुक्तिबोध जैसे कवियों की जटिलता को व्याख्यायित किया और आधुनिक कविता को समझने के नए औजार विकसित किए।

दूसरी परम्परा की खोज: यह पुस्तक केवल हजारी प्रसाद द्विवेदी पर केंद्रित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और साहित्य की उस धारा की पहचान है जो शास्त्र के समानांतर लोक से जुड़ती है।

छायावाद: नामवर जी ने प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के काव्य को सामंती जड़ता के विरुद्ध मनुष्य की मुक्ति के स्वर के रूप में प्रतिष्ठित किया।
उनकी आलोचना केवल 'निर्णय' नहीं देती थी, बल्कि वह रचना के भीतर छिपे सामाजिक और ऐतिहासिक द्वंद्वों को उजागर करती थी। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा को जकड़न से मुक्त कर उसे 'सृजनात्मक लचीलापन' प्रदान किया।

प्रकाशित कृतियाॅं

बक़लम ख़ुद - 1951ई॰ (व्यक्तिव्यंजक निबन्धों का यह संग्रह लम्बे समय तक अनुपलब्ध रहने के बाद सन् 2013 ई॰ में भारत यायावर के सम्पादन में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक प्रारम्भिक रचनाएँ में नामवर जी की उपलब्ध कविताओं तथा विविध विधाओं की गद्य रचनाओं के साथ संकलित होकर पुनः सुलभ हो गया है।)
हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग - 1952 (मूलतः एम॰ ए॰ कक्षा के लिए लघु शोध-प्रबंध के रूप में लिखित; पुनर्लिखित रूप में 1954 ई॰)
पृथ्वीराज रासो की भाषा - 1956 (मूलतः पीएच॰डी॰ हेतु शोध-प्रबंध के रूप में लिखित; संशोधित संस्करण 'पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य')
आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ - 1954
छायावाद - 1955
इतिहास और आलोचना - 1957
कहानी : नयी कहानी - 1964
कविता के नये प्रतिमान - 1968
दूसरी परम्परा की खोज - 1982
वाद विवाद संवाद - 1989
आलोचक के मुख से - 2005 (व्याख्यानों का संकलन, संपादक- खगेंद्र ठाकुर)
कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता - 2010 (लिखित समीक्षात्मक निबंधों का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)
हिन्दी का गद्यपर्व - 2010 (लिखित समीक्षात्मक निबंधों का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)
प्रेमचन्द और भारतीय समाज - 2010 (लिखित एवं वाचिक का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)
ज़माने से दो दो हाथ - 2010 (लिखित एवं वाचिक का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)
साहित्य की पहचान - 2012 (वाचिक का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)
आलोचना और विचारधारा - 2012 (वाचिक का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)
आलोचना और संवाद - 2018 (लिखित समीक्षात्मक निबंधों का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)
पूर्वरंग - 2018 (मुख्यतः आरंभिक रचनाकाल में लिखित समीक्षात्मक निबंधों एवं टिप्पणियों का संकलन; सं॰ आशीष त्रिपाठी)

साक्षात्कार-संवाद
कहना न होगा - 1994
बात बात में बात - 2006 (सं॰ डॉ॰ समीक्षा ठाकुर)
सम्मुख - 2012 (सं॰ आशीष त्रिपाठी)
साथ साथ - 2012 (सं॰ आशीष त्रिपाठी)

पत्र-संग्रह
काशी के नाम - 2006
तुम्हारा नामवर

संकलन-संचयन
नामवर संचयिता
हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल (पूर्व प्रकाशित सामग्रियों का ही विषय-केंद्रित एकत्र प्रस्तुतिकरण)
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जययात्रा (पूर्व प्रकाशित सामग्रियों का ही विषय-केंद्रित एकत्र प्रस्तुतिकरण)
द्वाभा
छायावाद: प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत (पूर्व प्रकाशित सामग्रियों का ही विषय-केंद्रित एकत्र प्रस्तुतिकरण)
रामविलास शर्मा (पूर्व प्रकाशित सामग्रियों का ही विषय-केंद्रित एकत्र प्रस्तुतिकरण)
इनके अतिरिक्त नामवर जी के जे॰एन॰यू॰ के क्लास नोट्स भी उनके तीन छात्रों शैलेश कुमार, मधुप कुमार एवं नीलम सिंह के सम्पादन में नामवर के नोट्स नाम से प्रकाशित हुए हैं।

संपादक और संगठक के रूप में भूमिका

नामवर जी ने केवल लिखा ही नहीं, बल्कि लेखकों की पीढ़ियाँ तैयार कीं। 'जनयुग' और 'आलोचना' (त्रैमासिक) पत्रिकाओं के संपादक के रूप में उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता के मानक स्थापित किए। 'आलोचना' पत्रिका उनके संपादन में वैचारिक विमर्श का वह मंच बनी जहाँ हर विचारधारा के लेखक के लिए संवाद के द्वार खुले थे। उन्होंने 'कहानी: नयी कहानी' के माध्यम से कथा साहित्य में आए बदलावों को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया।

सम्पादित पुस्तकें

संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो - 1952 (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के साथ)
पुरानी राजस्थानी - 1955 (मूल लेखक- डाॅ॰ एल॰ पी॰ तेस्सितोरी; अनुवादक - नामवर सिंह)
चिन्तामणि भाग-3 (1983)
कार्ल मार्क्स : कला और साहित्य चिन्तन (अनुवादक- गोरख पांडेय)
नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ राजकमल प्रकाशन
मलयज की डायरी (तीन खण्डों में)
आधुनिक हिन्दी उपन्यास भाग-2
रामचन्द्र शुक्ल रचनावली (सह सम्पादक - आशीष त्रिपाठी)
शमशेर बहादुर सिंहः प्रतिनिधि कविताएं, राजकमल प्रकाशन

अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य

नामवर सिंह महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (चांसलर) होने से पहले राजा राममोहन राय पुस्तकालय प्रतिष्ठान के अध्यक्ष (1993-96) भी रह चुके हैं।

सम्मान

साहित्य अकादमी पुरस्कार - 1971"कविता के नये प्रतिमान" के लिए
शलाका सम्मान हिंदी अकादमी, दिल्ली की ओर से
'साहित्य भूषण सम्मान' उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से
शब्दसाधक शिखर सम्मान - 2010 ('पाखी' तथा इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी की ओर से)
महावीरप्रसाद द्विवेदी सम्मान - 21 दिसम्बर 2010

वाचिक आलोचना और जीवंत संवाद

अपने अंतिम वर्षों में नामवर सिंह 'वाचिक आलोचना' के पुरोधा बने। उनके व्याख्यान, जो बाद में 'आलोचक के मुख से' जैसी पुस्तकों के रूप में संकलित हुए, यह बताते हैं कि आलोचना केवल लिखित अनुशासन नहीं है, बल्कि वह एक निरंतर चलने वाली संवाद प्रक्रिया है। वे विपक्षी विचारों का सम्मान करते थे और अक्सर कहते थे कि बिना असहमति के लोकतंत्र और साहित्य दोनों मृतप्राय हैं।

निष्कर्ष: आज की प्रासंगिकता

आज के दौर में जब विमर्श अक्सर एकालाप में बदल रहे हैं, नामवर सिंह की 'वाद-विवाद-संवाद' की शैली बहुत याद आती है। उन्होंने हमें सिखाया कि आलोचना का अर्थ केवल दोष निकालना नहीं, बल्कि रचना की शक्ति को पहचानना है। वे 'नामवर' (प्रसिद्ध) तो थे ही, पर सही अर्थों में वे हिन्दी साहित्य के 'लोकतांत्रिक विवेक' के प्रहरी थे।

'मीमांसा' का यह विशेषांक उनके उसी संघर्ष, उनकी उसी दृष्टि और उनके उसी अदम्य जिजीविषा को समर्पित है। हम उनके अवदान का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ी यह समझ सके कि शब्द जब विवेक के साथ मिलते हैं, तो वे इतिहास कैसे रचते हैं।
- संपादक, 'मीमांसा'


अस्वीकरण (Disclaimer)

इस विशेषांक 'नामवर सिंह: आलोचना की दूसरी परम्परा' में प्रकाशित सभी आलेख, संस्मरण और विचार लेखकों के निजी मत हैं। पत्रिका का प्रबंधन या संपादकीय मंडल लेखक के विचारों से पूर्णतः सहमत हो, यह अनिवार्य नहीं है। लेखों में प्रयुक्त तथ्यों, ऐतिहासिक संदर्भों और उद्धरणों की सत्यता की जिम्मेदारी संबंधित लेखक की होगी। 'मीमांसा' पत्रिका का उद्देश्य केवल डॉ. नामवर सिंह के साहित्यिक अवदान पर एक स्वस्थ और बौद्धिक विमर्श को प्रोत्साहन देना है। किसी भी प्रकार के अनजाने तथ्यात्मक त्रुटि के लिए पत्रिका क्षमाप्रार्थी है।

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