साहित्य और सिने जगत में 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' के अमर चितेरे—पंडित नरेंद्र शर्मा। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। जयंती विशेषांक। संपादकीय आलेख।



आज 'मीमांसा' का यह पन्ना एक ऐसे व्यक्तित्व की सुगंध से महक रहा है, जिन्होंने अपनी लेखनी से भारतीय संस्कृति के कैनवास पर भक्ति, दर्शन और प्रेम के अमिट रंग भरे हैं। आज हम नमन कर रहे हैं- पंडित नरेंद्र शर्मा को। वह नाम, जो न केवल एक कवि था, बल्कि जिसने आधुनिक भारत की 'आवाज़' (विविध भारती) को गढ़ा।

उत्तर प्रदेश के खुर्जा जहांगीरपुर (बुलंदशहर) में जन्मे पंडित जी ने प्रयागराज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। विडंबना देखिए, अंग्रेजी के विद्वान ने हिंदी को वह ऊँचाई दी कि आज उनके बिना हिंदी गीत और कविता की चर्चा अधूरी है। साल 1934 में 'अभ्युदय' पत्रिका के संपादन से शुरू हुआ उनका सफर, आगे चलकर भारतीय जनमानस के कंठ का हार बन गया।

क्या आप जानते हैं कि जिस 'विविध भारती' के गीतों को सुनकर हमारी पीढ़ियाँ जवान हुईं, उसकी स्थापना पंडित नरेंद्र शर्मा ने ही की थी? रेडियो की दुनिया में उनका योगदान अतुलनीय है।

लेकिन उससे भी सुंदर था उनका मानवीय पक्ष। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर उन्हें अपने पिता के समान मानती थीं। लता जी ने स्वयं स्वीकार किया था कि जीवन के कठिन मोड़ों पर पंडित जी की सलाह उनके लिए प्रकाश स्तंभ की तरह रही। यह एक कलाकार का दूसरे कलाकार के प्रति वह 'वत्सल' भाव था, जो आज के दौर में दुर्लभ है।

सिनेमा में दर्शन की गंगा

पंडित जी ने 100 से अधिक फिल्मों के लिए गीत लिखे, लेकिन राज कपूर की फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' का शीर्षक गीत लिखकर उन्होंने इतिहास रच दिया।

"ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है..."

इन चंद पंक्तियों में उन्होंने उपनिषदों का सार पिरो दिया। इसके लिए उन्हें फिल्मफेयर का नामांकन भी मिला। 'प्रेम रोग' और 'भाभी की चूड़ियां' जैसी फिल्मों में उनके लिखे गीत आज भी शालीनता और माधुर्य का प्रतीक हैं।

पंडित जी का साहित्यिक सफर केवल कागजों तक सीमित नहीं था। मात्र 21 वर्ष की आयु में महामना मदन मोहन मालवीय के 'अभ्युदय' से शुरू हुई उनकी यात्रा, उन्हें स्वाधीनता संग्राम के सींखचों तक ले गई। 1940 से 1943 के बीच वाराणसी और देवली की जेलों में उन्होंने जयप्रकाश नारायण और संपूर्णानंद जैसे दिग्गजों के साथ वक्त बिताया। विश्वास कीजिए, एक कवि का 19 दिनों तक अनशन करना उसकी वैचारिक दृढ़ता का प्रमाण था। जेल की उन सलाखों ने उनके भीतर के 'प्रवासी' को और अधिक प्रखर बना दिया।

साहित्यिक क्षितिज के देदीप्यमान नक्षत्र

1930 का दशक हिंदी कविता का स्वर्ण काल था। उस दौर में नरेंद्र शर्मा की लोकप्रियता का आलम यह था कि उनका मुकाबला सीधे हरिवंशराय बच्चन से होता था। 1931 में 'चांद' पत्रिका से शुरू हुआ उनका काव्य-सफर 'प्रवासी के गीत', 'मिट्टी और फूल' और 'अग्निशस्य' जैसी कालजयी कृतियों तक पहुँचा। उन्होंने सुमित्रानंदन पंत के साथ 'रूपाभ' का संपादन कर प्रगतिशील चेतना को नई दिशा दी।

युसूफ खान को 'दिलीप कुमार' बनाने वाले पारखी

यह तथ्य आज भी बहुतों के लिए विस्मयकारी है कि भारतीय सिनेमा के 'ट्रेजेडी किंग' को उनका नाम पंडित नरेंद्र शर्मा ने दिया था। जब बॉम्बे टॉकीज की देविका रानी एक युवा पठान (युसूफ खान) को 'ज्वार-भाटा' से लॉन्च कर रही थीं, तब पंडित जी ने ही 'दिलीप कुमार' नाम सुझाया था। उन्होंने न केवल नाम दिया, बल्कि अपने गीतों से सिनेमा को साहित्यिक गरिमा भी प्रदान की।

अपने जीवन के सांध्य काल में उन्होंने बी.आर. चोपड़ा के कालजयी धारावाहिक 'महाभारत' के लिए वैचारिक परामर्शदाता और गीतकार के रूप में कार्य किया। दुःखद यह रहा कि इस शो के प्रसारण के मात्र चार महीने बाद ही, 12 फरवरी 1989 को वे हमसे बिछड़ गए। लेकिन 'महाभारत' के माध्यम से उनके शब्द आज भी हर घर में गूँज रहे हैं।

 11 फरवरी, 1989 को इस महान शब्द-साधक ने अपनी देह त्यागी, मानो अपना कार्य पूर्ण कर कुरुक्षेत्र की उस यात्रा पर निकल गए हों जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।

पंडित जी की अमूल्य साहित्यिक धरोहर (एक नज़र में)


| कविता संग्रह | प्रवासी के गीत, मिट्टी और फूल, अग्निशस्य, प्यासा निर्झर |
| प्रबंध काव्य | द्रौपदी, मनोकामिनी, उत्तरजय सुवर्णा |
| जीवनी | मोहनदास कर्मचंद गांधी: एक प्रेरक जीवनी |
| सिनेमा | 55 फिल्मों में 650 गीत और 'महाभारत' का लेखन |

'मीमांसा' के इस विशेषांक का उद्देश्य केवल उनके जीवन के तथ्यों को दोहराना नहीं, बल्कि उस 'दृष्टि' को याद करना है जिसने साहित्य और सिनेमा के बीच की खाई को पाटा। पंडित नरेंद्र शर्मा जैसे साधक रोज-रोज पैदा नहीं होते। उम्मीद है, यह अंक आपके भीतर के साहित्य-प्रेमी को उस युग की याद दिलाएगा जहाँ शब्द केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कार हुआ करते थे।
साहित्यिक संवेदनाओं के साथ,
— संपादक
वेब पत्रिका 'मीमांसा'

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