वेब पत्रिका 'मीमांसा' पर अमन कुमार होली की कहानी "अमृत महोत्सव में चंद्र देव से मेरी बात-चीत "
सवा सौ साल पहले बंग महिला ने चंद्रदेव को लॉर्ड कर्जन के पास अर्जी भेजने की सलाह दी थी। पर आज के डिजिटल इंडिया में चंद्रदेव को एप्लीकेशन की नहीं, बल्कि आधार कार्ड की ज़रूरत है। वरना कहीं ऐसा न हो कि अमावस्या की छुट्टी को 'वर्क फ्रॉम होम' समझकर उनकी सैलरी काट ली जाए। आइए, अमन कुमार होली की अमृत काल के इस अनोखे कहानी को पढ़ें।
मैंने एक रात बंग महिला की दोनों कहानियाॅं पढ़ी और करीब साढ़े ग्यारह बजे मेरी ऑंखों पर नींद का पहरा हो गया। मैं ऊंघता रहा और लेट गया। उस रात सपने में देखता हूॅं कि मेरे समक्ष चंद्रदेव खड़े हैं। मैं तत्काल उठा और साष्टांग दंडवत हो गया उन्होंने मुझे सीने से लगाकर आशीर्वाद दिया। मैंने उनसे कहा - हे चिरकाल के साक्षी भगवान चंद्रदेव! आज से लगभग सवा सौ साल पहले मेरी एक पूर्वजा ने आपसे कुछ विनती की थी। तब हम गुलाम थे और आप हमारे दुख के गवाह। आज मैं अमन, स्वतंत्रत भारत के अमृत महोत्सव के उल्लास में आपसे दो-चार बातें करना चाहता हूँ।
सुना है प्रभु, आपकी 'सर्विस' (नौकरी) की शर्तें आज भी वैसी ही हैं? वही पुरानी घटती-बढ़ती काया और वही महीने में कई दिनों की 'छुट्टी'। पर चंद्रदेव! अब वह 1904 वाला भारत नहीं रहा। अब हमारे यहाँ 'अटेंडेंस' (हाजिरी) के लिए बायोमेट्रिक मशीनें लग गई हैं। आपकी इस 'मर्जी की नौकरी' को देखकर तो हमारे यहाँ के कर्मचारी ईर्ष्या से नीले पड़ जाएँ। महीने में पंद्रह दिन आधे-अधूरे आना और अमावस्या को तो 'वर्क फ्रॉम होम' के नाम पर पूरी तरह गायब हो जाना! सच कहिए, आपको इस 'इर्रेगुलर' (अनियमित) ड्यूटी की सैलरी किस आधार पर मिलती है? क्या कुबेर देव के बैंक में आपकी 'परफॉरमेंस लिंक्ड इंसेंटिव' की नहीं?
भगवान! राजेंद्र बाला ने आपको 'लॉर्ड कर्जन' को एप्लीकेशन भेजने की सलाह दी थी, पर अब वह ज़माना लद गया। अब तो हम आत्मनिर्भर हैं। आपको अब किसी 'गोरे प्रभु' की चाकरी की ज़रूरत नहीं। देखिए न, हमारे यहाँ के वैज्ञानिकों ने 'चंद्रयान' भेजकर आपके घर का कोना-कोना छान मारा है। अब तो आपके दक्षिण ध्रुव पर भी हमारे तिरंगे लहरा रहे हैं । जिसे कुछ मूढ़ मनुष्य 'कलंक' कहते थे, हमारे वैज्ञानिकों ने वहाँ पानी की खोज कर डाली है। अब तो वह दाग नहीं, बल्कि 'खनिज' की खान है!
यदि आपकी आँखें अब भी धुंधली हैं, तो कृपया चश्मा न लगाएँ, बल्कि भारत के किसी 'डिजिटल आई सेंटर' में आकर चेकअप करा लें। वैसे हमारे पड़ोसी देश नेपाल में भी आंखों का अच्छा और किफायती चेकअप होता है। आप अपनी सुविधानुसार देख लीजिएगा। खैर, अब हमारे यहाँ 'प्लेग' का डर नहीं, हमने तो बड़ी-बड़ी महामारियों को 'वैक्सीन' से पस्त कर दिया है। चित्रगुप्त जी को अब टाइपराइटर की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, अब तो यहाँ 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) का बोलबाला है। वे चाहें तो नरक और स्वर्ग का हिसाब 'क्लाउड' पर रख सकते हैं।
हे निशानाथ! अब तो आप 'आजाद भारत' के मेहमान हैं। अब आप पर किसी राहु-केतु का ग्रहण लगे या न लगे, पर हमारे कैमरों की 'लाइव स्ट्रीमिंग' से आप नहीं बच सकते। अब आपकी 'सैलरी' केवल चाॅंदनी बिखेरने की नहीं, बल्कि पर्यटन को बढ़ावा देने की भी होनी चाहिए, क्योंकि बहुत जल्द हम लोग आपके पास 'प्लॉट' (जमीन) खरीदने की योजना बना रहे हैं। आशा है, अब आप अपनी हाजिरी में थोड़ी सुधार करेंगे और अमृत महोत्सव के इस प्रकाश में अपनी चाॅंदनी का 'कोटा' पूरा देंगे। हे त्रिलोकीनाथ! अभी तो मैं आपकी ड्यूटी और अटेंडेंस की बात ही कर रहा था कि अचानक मुझे एक परम आवश्यक और 'अर्जेंट' विषय का स्मरण हो आया। भगवान! क्या आपने अभी तक अपना 'आधार कार्ड' बनवाया है? देखिए, अनसुनी मत कीजिएगा। आप सोच रहे होंगे कि आप तो 'व्योमगामी' हैं, साक्षात देवता हैं, आपको इन कागजी झमेलों की क्या आवश्यकता? पर प्रभु, यह आजाद भारत का अमृत काल है। यहाँ अब पदवी और प्रकाश से काम नहीं चलता, यहाँ तो बारह अंकों का वह 'जादुई नंबर' ही आपकी असली पहचान है।
विस्मित न होइए! मैं सुनता हूँ कि आप कभी मृगशिरा नक्षत्र में होते हैं, तो कभी रोहिणी के संग। कभी आप पूर्ण होते हैं, तो कभी लुप्त। आपकी इस 'बदलती हुई काया' को देखकर हमारे यहाँ के 'UIDAI' वाले अधिकारी तो चक्कर खा जाएँगे। वे आपकी 'आईरिस स्कैन' (ऑंखों की पुतली) कैसे लेंगे, जबकि आपकी जोत ही घटती-बढ़ती रहती है? और आपकी अंगुलियों के निशान? प्रभु, आपके पास तो केवल शीतल किरणें हैं!
पर याद रखिएगा, यदि आपने आधार न बनवाया, तो आपकी 'चांदनी' की सारी सब्सिडी रोक दी जाएगी। क्या आपको अपनी सैलरी 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (DBT) के जरिए नहीं चाहिए?
सोचिए, यदि कल को आपको हमारे किसी राशन डिपो से अमृत की जगह आधुनिक राशन लेना पड़ा, या किसी बैंक में खाता खुलवाना पड़ा, तो बिना आधार के आप अनआइडेंटिफाइड (अज्ञात) घोषित कर दिए जाएंगे। फिर चाहे आप कितने ही 'निशानाथ' या 'शशांक' क्यों न कहलाते हों, सरकारी फाइलों में आप केवल एक 'घुमंतू खगोलीय पिंड' बनकर रह जाऍंगे।
भगवान! बंग महिला ने तो आपको 'लॉर्ड कर्जन' को एप्लीकेशन भेजने को कहा था, पर मैं आपसे कहता हूँ कि किसी कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) पर जाकर अपनी एक सुंदर सी फोटो खिंचवा लीजिए। हाँ, फोटो खिंचवाते समय थोड़ा स्थिर रहिएगा, वरना आपकी 'फेज' बदलने की आदत के कारण कार्ड पर फोटो किसी और की ही छप जाएगी।
कहीं ऐसा न हो कि आप अमावस्या के दिन धरती पर भ्रमण करने आऍं और पुलिस वाले आपसे आपकी आईडेंटिटी मांग लें। तब आप क्या कहेंगे? कि आप समुद्र के पुत्र हैं? प्रभु! आज के युग में पिता के नाम से ज्यादा आधार नंबर की साख है।
अतः हे देव! विलंब न करें। अपनी इस यूनिवर्सल पहचान को ज़रा डिजिटल जामा पहना लीजिए, वरना इस अमृत महोत्सव की भीड़ में आप कहीं लापता घोषित न कर दिए जाएं। हे सुधांशु! अभी मैं आपके आधार कार्ड और अटेंडेंस की चिंता कर ही रहा था कि एक उड़ती-उड़ती सनसनीखेज खबर मेरे कानों में पड़ी है। सुनकर आपके कान भी खड़े हो जाएंगे और शायद आप अपनी शीतल चाॅंदनी बिखेरना भूलकर थोड़ा अलर्ट मोड में आ जाऍं।
भगवान! खबर मिली है कि भारत के परम प्रतापी प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी जी, अपने विशालकाय और भव्य बोइंग (Air India One) विमान में सवार होकर पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं। वे कन्याकुमारी से कश्मीर और कच्छ से कामरूप तक की धूल फाॅंक रहे हैं। पर ठहरिए! खबर यह भी है कि उनकी दूरदृष्टि अब केवल इस शस्य-श्यामला भूमि तक सीमित नहीं रही। वे अब अमृत काल के रथ पर सवार होकर, सीधे आपके 'चंद्रलोक' के द्वार खटखटाने भी आ सकते हैं!
सोचिए प्रभु! जब वह चमचमाता बोइंग विमान आपकी धवल चाॅंदनी को चीरता हुआ आपके आँगन में उतरेगा, तो आपके मृग और शश (खरगोश) डर के मारे कहाँ छिपेंगे?
अभी तक तो आपने केवल हमारे 'विक्रम' और 'प्रज्ञान' जैसे छोटे-छोटे खिलौनों को झेला था, जो आपके घर की मिट्टी खोदकर चले आए। पर अब तो स्वयं प्रधान-सेवक अपनी टोली के साथ पधारने वाले हैं। वे 'मेक इन इंडिया' का झंडा लेकर आएंगे और मुमकिन है कि आपके यहाँ भी 'डिजिटल इंडिया' का ढाॅंचा खड़ा कर दें।
भगवान चंद्रदेव! यदि वे आ गए, तो सबसे पहले आपकी उस पुराने ढर्रे की लाइफस्टाइल पर सवाल उठाएंगे। वे कहेंगे - "भाइयों-बहनों! चंद्रलोक में अभी तक सोलर पैनल क्यों नहीं लगे? यहाँ 'स्वच्छ भारत अभियान' के तहत झाड़ू क्यों नहीं लगी?" वे आपके यहाँ भी 'मन की बात' का प्रसारण शुरू कर देंगे। फिर आपको अपनी अटेंडेंस की चिंता और बढ़ानी होगी, क्योंकि वे 'रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म' (सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन) में विश्वास रखते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आपके चंद्रलोक को भी 'स्मार्ट सिटी' घोषित कर दिया जाए और आपको अपनी चाॅंदनी का टेंडर जारी करना पड़े!
अतएव हे देव! मेरा सविनय निवेदन है कि अपना सड़क परिवहन विभाग और उड्डयन विभाग को झटपट ई-मेल भेजिए और तमाम सोशल मीडिया में सूचना दे दीजिए तथा 'बोइंग-पैड' (हेलीपैड) तैयार रखिए। अपनी अमृता और कमला देवियों को कहिए कि वे 'स्वागतम्' की तैयारी करें । और हाँ, वह जो मैंने 'आधार कार्ड' की बात कही थी, उसे हल्के में मत लीजिएगा। कहीं ऐसा न हो कि मोदी जी आपके 'कलंक' को देखकर कहें— "मित्रों! पिछली सरकारों ने इस दाग को साफ करने के लिए कुछ नहीं किया, पर हम इसे 'साफ-सुथरा चंद्रलोक' बनाकर दम लेंगे।"
अमन कुमार होली की इस चेतावनी को गांठ बाॅंध लीजिए प्रभु! अमृत महोत्सव का यह 'फ्लाइंग बोइंग' कभी भी आपके क्षितिज पर अवतरित हो सकता है।
हे विमल-हृदय निशाकर!
अंत में एक और समाचार सुन लीजिए, जिसने आजकल हमारे इस शस्य-श्यामला भारतवर्ष के कण-कण को पुलकित कर दिया है। प्रभु, क्या आपके चंद्रलोक के शांत वातावरण में 'राम नाम' की कोई मधुर ध्वनि सुनाई पड़ी है?
आजकल तो यहाँ जिधर देखो, उधर उसी नाम की धूम है। अयोध्यापुरी में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का ऐसा भव्य और दिव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ है कि उसकी आभा के सामने आपकी धवल चाँदनी भी शायद कुछ फीकी पड़ जाए। सुना है, वहाँ जब आरती होती है, तो भक्तगण भाव-विभोर होकर आकाश की ओर देखते हैं—शायद वे आप ही के भीतर 'राम-लला' की परछाईं ढूंढते हों!
पर ध्यान रहे चन्द्रदेव! यदि आप अयोध्या आने का विचार करें, तो थोड़ा संभलकर। वहाँ आजकल भक्तों की इतनी भीड़ है कि आपके मृग-वाहन को पार्किंग मिलना भी दूभर हो जाएगा।
भगवान! बंग महिला ने तो आपको 'विश्वकर्मा' के वंशजों से मिलवाया था, पर आज के कारीगरों ने तो पत्थरों में प्राण फूंक दिए हैं। कहीं ऐसा न हो कि आप उस मंदिर की भव्यता देखकर अपनी 'अमरावती' को भूल जाएँ और वहीं 'रेजिडेंट कार्ड' बनवाकर बसने की जिद करने लगें।
धार्मिक मर्यादा का ध्यान रखते हुए बस इतना ही कहूँगा कि जिस राम के वंशज होने का गौरव सूर्य देव को प्राप्त है, उन्हीं राम की शीतलता आपके स्वभाव में बसती है। तो फिर इस 'अमृत काल' में आप केवल दूर से टक-टकी लगाकर क्यों देखते हैं? एक दिन अमावस्या की 'छुट्टी' लेकर साक्षात् दर्शन को क्यों नहीं चले आते?
हे त्रिलोकीनाथ! अभी तो मैं आपकी सुरक्षा और पहचान पत्र की ही बात कर रहा था कि मुझे याद आया प्रभु, आप अब भी उस पुराने 'आकाशवाणी' के भरोसे क्यों बैठे हैं? अब वह युग नहीं रहा कि नारद मुनि 'नारायण-नारायण' करते हुए आपको खबरें देंगे।
भगवान! अब हमारे यहाँ 5G का ऐसा मायाजाल बिछ गया है कि पलक झपकते ही डेटा पाताल से आकाश नाप लेता है। मेरा सविनय सुझाव है कि आप भी झटपट अपने चंद्रलोक में एक 5G टॉवर इंस्टॉल करवा लीजिए। और हाँ, प्रभु! अपना एक एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम अकाउंट भी खोल लीजिए। जब आप बादलों की ओट में छिपते हैं, तो कम से कम एक 'स्टोरी' तो डाल ही सकते हैं Hide and seek with Earthlings! #MoonVibes वरना यहाँ के लोग आपको आउटडेटेड मान लेंगे।
प्रभु! ज़रा संभलकर रहिएगा। समुद्र पार एक ट्रंप चाचा फिर से सत्ता के सिंहासन पर विराजमान हो गये हैं। वे बड़े टेढ़े आदमी हैं। वे हर चीज़ पर टैरिफ लगा देते हैं। कहीं ऐसा न हो कि आपकी चाॅंदनी को इंपोर्टेड गुड्स मानकर वे उस पर 50% का टैरिफ ठोक दें! फिर आपकी रोशनी अमेरिका की सड़कों पर महँगी बिकेगी और लोग कहेंगे कि "चांदनी अब आम आदमी की पहुँच से बाहर है।" इसलिए, उनसे उलझिएगा मत, बस अपनी मुस्कान बरकरार रखिएगा।
और हाँ सुधांशु! हमारे पड़ोसी चीन से तो साक्षात् सावधान रहने की ज़रूरत है। वह देश तो कलयुग का ब्रह्मा बन बैठा है। ब्रह्मा जी ने तो सृष्टि एक बार रची थी, पर ये चीनी भाई तो हर रोज़ एक नई दुनिया प्रकट कर देते हैं। सुना है उन्होंने अपना नकली सूरज तो बना ही लिया है, अब कहीं वे आपकी नकल उतारकर मेड इन चाइना चंद्रमा न लॉन्च कर दें! उनसे झगड़ा मोल मत लीजिएगा, वरना वे आपके चंद्रलोक की कॉपी बनाकर बाज़ार में सस्ते दाम पर बेच देंगे और आपकी ओरिजिनैलिटी पर सवालिया निशान लग जाएगा।
हे देव! अब आप केवल देवता नहीं, एक डेस्टिनेशन भी हैं। जब हमारे यहाँ के इन्फ्लुएंसर्स आपके यहाँ पहुँचेंगे, तो वे आपकी शीतल गोद में बैठकर रील बनाएंगे। उस समय अपनी शांति भंग मत होने दीजिएगा, बल्कि म्यूट का बटन दबाकर ध्यान लगा लीजिएगा। आप मेरी यह डिजिटल चेतावनी अपनी डायरी में नोट कर लीजिए प्रभु! क्योंकि अब ब्रह्मांड केवल देवताओं का नहीं, डिप्लोमेसी और डाटा का अखाड़ा बन चुका है।
इतने देर से चंद्रदेव मेरी विनती सुनते रहें और फिर बोलें
"वत्स अमन! तुम तो अपनी पूर्वजा बंग महिला से भी दो कदम आगे निकले। तुमने तो मेरी अटेंडेंस और आधार के बाद अब बीमारी का भी पिटारा खोल दिया! लो, अब ज़रा मेरा जवाब भी मुस्कुराकर सुन लो, तुम कहते हो कि तुम्हारे यहाँ कोरोना की महामारी आई और तुमने वैक्सीन के दो-दो, तीन-तीन डोज़ लगवा लिए। पर भाई, ज़रा मेरा भी तो हाल देखो! मैं तो युगों-युगों से 'सोशल डिस्टेंसिंग' का पालन कर रहा हूँ। लाखों मील की दूरी बनाए रखी है, फिर भी तुम पृथ्वीवासी चंद्रयान भेज-भेजकर मेरे पास संक्रमण पहुँचाने की ताक में रहते हो!
सुनो, मैंने सुना है कि तुम्हारी वह वैक्सीन लगवाने के बाद लोगों को बुखार आता है। अब भाई, मैं तो पहले से ही शीतल स्वभाव का ठहरा, अगर मुझे बुखार आ गया तो तुम्हारी चाँदनी तपती दोपहरी बन जाएगी! और हाँ, तुमने जो बूस्टर डोज़ की बात कही, तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं हर महीने खुद को बूस्ट करता हूँ? अमावस्या को ज़ीरो होकर पूर्णिमा तक जो धीरे-धीरे बढ़ता हूँ, वह मेरी अपनी नेचुरल वैक्सीन ही तो है।
भगवान धन्वन्तरि तो बेचारे यहाँ जड़ी-बूटियाँ कूटते रह गए और तुम लोगों ने डिजिटल सर्टिफिकेट वाला ऐसा खेल रचाया कि बिना उसके आदमी ट्रेन का टिकट भी न ले पाए। शुक्र है कि मेरे पास अभी तक कोई नारद मुनि वैक्सीन चेक करने नहीं आए, वरना मेरी तो यूनिवर्सल यात्रा ही रुक जाती!
खैर, तुम लोग अपनी सुई और शीशियों के साथ खुश रहो। मैं तो अपनी इस नेचुरल क्वारंटीन में ही सुखी हूँ। बस दुआ करो कि तुम्हारी उस बोइंग यात्रा के साथ कोई नया वायरस मेरे शांत घर में न आ जाए!।
अरे अमन! तुमने इतनी सारी विनोदपूर्ण बातें कीं, मैंने भी ठिठोली में उत्तर दिया। पर जैसे ही तुमने इस शस्य-श्यामला धरती की बेटियों का ज़िक्र किया, मेरी चाँदनी फीकी पड़ गई और मेरा मन बादलों के पीछे छिपने को व्याकुल हो उठा।
प्रभु चंद्रदेव की आँखों में जैसे करुणा का समुद्र उमड़ आया हो। उन्होंने एक लंबी ठंडी आह भरते हुए कहा—
"अमन, तुम पूछते हो मैं महीने में कई दिन गायब क्यों रहता हूँ? कभी सोचा है कि जब तुम्हारी इस धरती पर किसी 'बेटी' की अस्मत और उसके सपनों पर अंधेरा छाया जाता है, तो उस शर्मिंदगी को न देख पाने के कारण मैं अपना मुँह छिपा लेता हूँ। जिसे तुम मेरी अटेंडेंस में कमी कहते हो, वह दरअसल मेरा विरोध है उस समाज के खिलाफ जो अपनी 'शक्ति' का पूजन तो करता है, पर अपनी 'बेटियों' को सुरक्षा नहीं दे पाता।"
चंद्रदेव का स्वर और भी गंभीर हो गया , बंग महिला ने जब सवा सौ साल पहले मुझसे बात की थी, तब भी मुझे भारत की नारियों की दशा पर दुख था। आज तुम आज़ाद भारत और अमृत काल की बात करते हो, चाँद पर तिरंगा फहराने का दंभ भरते हो, पर क्या तुम्हारी बेटियाँ आज भी रात की चाँदनी में निडर होकर टहल सकती हैं? क्या उन्हें कोख में ही मार देने वाली वह आधुनिक मशीनें बंद हो गईं?
अमन, मुझे आधार कार्ड की ज़रूरत नहीं, क्योंकि मैं तो हर उस बेबस बेटी की आँखों के आँसुओं में अपनी परछाईं देखता हूँ। जब तक तुम्हारे यहाँ बेटियों की सुरक्षा के लिए जागरूकता की वैक्सीन नहीं बनेगी और जब तक उनके सम्मान का 'भव्य मंदिर' हर मनुष्य के हृदय में नहीं बनेगा, तब तक मेरा यह 'कलंक' कभी नहीं धुलेगा। चाहे तुम कितने ही गज्जर प्रोफेसरों से मेरा मुँह साफ करवा लो।
इतना कहकर निशानाथ चुप हो गए। उनकी शीतल किरणों में आज एक अजीब सी कंपकपी थी। वे धीरे-धीरे बादलों की ओट में जाने लगे। जाते-जाते बस इतना ही कह गए
"जाओ अमन! अगली बार जब मुझसे बात करने आओ, तो किसी ऐसी खबर के साथ आना कि अब भारत की किसी बेटी को अंधेरे से डर नहीं लगता। उस दिन मैं 'अमावस्या' की छुट्टी रद्द करूँगा और पूरी रात अपनी सोलह कलाओं के साथ तुम्हारे आँगन में दीवाली मनाऊँगा।
©अमन कुमार होली
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