शोध विषय का निर्धारण

साहित्य में शोध करना किसी ठंडी मशीन के पुर्जों को खोलने जैसा यांत्रिक कार्य नहीं है, बल्कि यह एक खिलते हुए फूल की पंखुड़ियों को बिना चोट पहुँचाए उसके पराग तक पहुँचने की 'संवेदनशील यात्रा' है। अक्सर बाज़ार में उपलब्ध शोध की पुस्तकें भारी-भरकम शब्दावली और शुष्क वैज्ञानिक फार्मूलों के बोझ तले दबी होती हैं, जो एक नए शोधार्थी के मन में जिज्ञासा के स्थान पर भय पैदा कर देती हैं। प्रस्तुत पुस्तक उसी 'भय' को 'भरोसे' में बदलने का एक विनम्र प्रयास है।
शोध क्या है? किताबों के ढेर से किसी पुराने सच को दोहराना शोध नहीं है। शोध तो वह 'नव्य-दृष्टि' है, जो हमें उस सच को आज के संदर्भ में देखने का चश्मा देती है। सुदामा पांडेय 'धूमिल' जब संसद और सड़क के बीच का संघर्ष लिखते हैं, तो एक शोधार्थी का कार्य केवल उनकी पंक्तियों को उद्धृत करना नहीं, बल्कि उन पंक्तियों के पीछे छिपी आम आदमी की 'मूक चीख' को वर्तमान समाज के कैनवास पर उकेरना है।
बाज़ार की जटिलता बनाम साहित्य की सरलता
अक्सर 'हाइपोथिसिस' (Hypothesis) या 'मेथोडोलॉजी' (Methodology) जैसे शब्द शोधार्थी को डरा देते हैं। हमने इस पुस्तक में इन्हें 'संभावित संकल्प' और 'कार्य-यात्रा का मार्ग' जैसे सुगम शब्दों से प्रतिस्थापित किया है। हमारा उद्देश्य शोध को पुस्तकालयों की अलमारियों से निकालकर 'जन-संवाद' का हिस्सा बनाना है। यह उन सभी नवागत शोधार्थियों के लिए एक 'सहज मार्गदर्शिका' है, जो साहित्य को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि उसे जीकर समाज के लिए कुछ नया सृजन करना चाहते हैं।


आइए, कठिन पारिभाषिक शब्दों के कुहासे को छाँटकर, सरलता के उजाले में शोध की इस पावन यात्रा का आरंभ करें।
इन 5 'मृदु सोपानों' के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है:

1. मनोअनुकूलन (स्वयं की रुचि का अन्वेषण)
शोध का विषय 'थोपा' हुआ नहीं, बल्कि 'चुना' हुआ होना चाहिए। बाज़ार की भाषा इसे 'समस्या चयन' कहती है, लेकिन साहित्यिक दृष्टि से यह 'हृदय की पुकार' है।
नवीन दृष्टि: शोधार्थी को स्वयं से पूछना चाहिए कि किस रचनाकार या विधा को पढ़ते समय उसके भीतर हलचल होती है? जहाँ आपकी जिज्ञासा और आनंद का मिलन हो, वहीं शोध का बीज छिपा है।

2. क्षितिज विस्तार (विषय की व्यापकता और सीमा)
अक्सर छात्र बहुत बड़ा विषय चुन लेते हैं (जैसे: संपूर्ण छायावाद)। इसे 'विषय सीमांकन' के बजाय 'दृष्टि की एकाग्रता' कहें।
मृदु शैली: जैसे एक माली पूरे बगीचे के बजाय एक विशेष क्यारी पर ध्यान देता है, वैसे ही शोधार्थी को अनंत साहित्य में से एक 'निश्चित क्षितिज' चुनना चाहिए ताकि विश्लेषण में गहराई आ सके।

3. नव्य-उन्मेष (मौलिकता और नवीनता)
वैज्ञानिक भाषा में इसे 'गैप एनालिसिस' कहते हैं। सरल शब्दों में यह 'अनकही बात की खोज' है।
सरल विकल्प: आपकी पुस्तक यह बताए कि शोध का अर्थ केवल पिसे हुए को पीसना (पुनरावृत्ति) नहीं है, बल्कि साहित्य के उस कोने में दीया जलाना है जहाँ अभी तक अंधेरा है। नया विषय वह है जो समाज को एक 'नई खिड़की' से देखने का अवसर दे।

4. प्रासंगिकता का सेतु (समाज और साहित्य का जुड़ाव)
शोध केवल पुस्तकालयों की धूल झाड़ने के लिए नहीं, बल्कि 'समय से संवाद' के लिए होना चाहिए।
हृदयस्पर्शी दृष्टिकोण: विषय ऐसा हो जो आज के मनुष्य की संवेदनाओं को स्पर्श करे। यदि आप कबीर या धूमिल को पढ़ रहे हैं, तो उनकी बातें आज के बाज़ारवाद या संघर्षों के बीच कितनी सार्थक हैं? विषय निर्धारण में यह 'जीवंतता' अनिवार्य है।

5. अभिव्यक्ति की सुघड़ता (शीर्षक का लालित्य)
अस्पष्ट और जटिल शीर्षकों के बजाय 'अर्थपूर्ण और आकर्षक शीर्षक' चुनें।
सुस्पष्ट विकल्प: शोध का नाम ऐसा हो जो विषय का परिचय भी दे और पढ़ने वाले में कौतूहल भी जगाए। भारी-भरकम शब्दों के जाल के स्थान पर 'पारदर्शी शब्दावली' का प्रयोग करें।

निष्कर्ष: शोध का सजल साक्षात्कार

अंततः, साहित्य में शोध का विषय चुनना किसी गणितीय समीकरण को हल करना नहीं, बल्कि एक 'साधना' की नींव रखना है। बाज़ार की शुष्क और पथरीली शब्दावली से हटकर जब हम 'मनोअनुकूलन' और 'क्षितिज विस्तार' जैसे सहज सोपानों से गुज़रते हैं, तब शोध का मार्ग बोझ नहीं बल्कि एक 'आनंदमयी यात्रा' बन जाता है।
यह पुस्तक केवल तथ्यों के संकलन की विधि नहीं सिखाती, बल्कि यह शोधार्थी के भीतर उस 'द्रष्टा' को जाग्रत करती है जो धूल भरी पांडुलिपियों में भी समाज की धड़कन सुन सके। यदि आपका विषय आपके 'हृदय की पुकार' है और वह समय के साथ 'संवाद' करने में सक्षम है, तो विश्वास मानिए कि आपका शोध केवल विश्वविद्यालय की डिग्री तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वह भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक 'नया वातायन' (खिड़की) खोलेगा।
आइए, इस 'मृदु शैली' को अपनाकर हम शोध को पुस्तकालयों के सन्नाटे से निकालकर जन-मन की चेतना का हिस्सा बनाएँ। क्योंकि शोध वही सार्थक है, जो समाज के अँधेरे कोनों में अपनी संवेदना का दीया जला सके।

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