भारतेंदु युग की प्रमुख प्रवृत्तियाॅं और युगीन संदर्भ। हिंदी साहित्य। वेब पत्रिका 'मीमांसा'। अमन कुमार होली।

वेब पत्रिका 'मीमांसा' के इस विशेष अंक में हम हिंदी साहित्य के उस संधिकाल की पड़ताल कर रहे हैं, जहाँ से हमारी आधुनिकता की नींव पड़ी अर्थात 'भारतेंदु युग'। हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का प्रथम चरण, जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'प्रथम उत्थान' और सामान्यतः 'भारतेंदु युग' (1868-1900 ई.) कहा जाता है, भारतीय चेतना के पुनर्जागरण का काल था। यह वह समय था जब हिंदी साहित्य केवल दरबारी विलासिता से निकलकर जन-जीवन और राष्ट्रीय समस्याओं से जुड़ रहा था। इतिहास के पन्नों पर जब हम हिंदी साहित्य के आधुनिक काल की पदचाप सुनते हैं, तो हमें 'भारतेंदु युग' एक ऐसी देहलीज की तरह दिखाई देता है, जहाँ मध्यकालीन जड़ता का अंत हो रहा था और आधुनिक चेतना का सूर्योदय। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब इसे 'प्रथम उत्थान' की संज्ञा दी, तो उनका संकेत स्पष्ट था कि हिंदी साहित्य अब केवल दरबारों की विलासिता या मठों की वैराग्यपूर्ण साधना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह आम आदमी की चौखट तक पहुँचने के लिए मचल रहा था। यह महज एक साहित्यिक कालखंड नहीं, बल्कि भारतीय समाज का 'पुनर्जागरण' (Renaissance) था।

इस युग की सबसे बड़ी शक्ति इसका अंतर्विरोध था। एक ओर सदियों से चली आ रही ब्रजभाषा की मधुरता थी, तो दूसरी ओर नई परिस्थितियों की मांग पर खड़ी होती 'खड़ी बोली' की तार्किकता। काव्य में जहाँ रीतिकाल के श्रृंगार  के अवशेष 'नख-शिख' वर्णन के रूप में शेष थे, वहीं समाज की विसंगतियों पर चोट करती 'समस्या-पूर्ति' की नई विधा अंगड़ाइयां ले रही थी। यह संक्रमण ही इस युग को जीवंत बनाता है।
भारतेंदु युग का साहित्य 'राजभक्ति' और 'राष्ट्रभक्ति' के एक अनोखे संतुलन पर खड़ा था। आज के चश्मे से देखने पर यह विरोधाभास लग सकता है कि एक ही कवि महारानी विक्टोरिया की जय-जयकार भी कर रहा है और अँग्रेजी शासन द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण पर "धन बिदेस चलि जात" का विलाप भी। किंतु, गहराई से देखें तो यह उस समय की कूटनीतिक अनिवार्यता थी। कवियों ने 'राजभक्ति' को एक सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल किया, जिसके भीतर भारतीय राष्ट्रवाद का बीज पल्लवित हो रहा था। यह वह काल था जब साहित्यकार केवल रचनाकार नहीं, बल्कि समाज के सजग प्रहरी (Sentinel) बन रहे थे।
इस युगांतरकारी परिवर्तन का सबसे बड़ा वाहक बनी 'मुद्रण संस्कृति'। छापेखाने की मशीन ने साहित्य को हस्तलिखित पोथियों के कैदखाने से आज़ाद कर 'लोकतांत्रिक' बना दिया। भारतेंदु मंडल के लेखकों बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र और प्रेमघन ने पत्र-पत्रिकाओं (जैसे 'कविवचनसुधा', 'ब्राह्मण') को अपना अस्त्र बनाया। इन पत्रिकाओं ने न केवल गद्य की नई विधाओं जैसे निबंध, नाटक और आलोचना को जन्म दिया, बल्कि जनता के बीच एक 'पब्लिक डिस्कोर्स' या जन-संवाद पैदा किया। जब 'हिंदी प्रदीप' में किसी पुस्तक की 'सच्ची समालोचना' छपती थी, तो वह केवल एक समीक्षा नहीं होती थी, बल्कि वह हिंदी भाषा के मानकीकरण और बौद्धिक चेतना की घोषणा होती थी।
अंततः, भारतेंदु युग को हम उस प्रस्थान बिंदु के रूप में देख सकते हैं जहाँ से हिंदी साहित्य ने जन-सरोकारों की ओर मुड़ना सीखा। यह युग बताता है कि साहित्य जब 'हास्य-व्यंग्य' और 'मुकरियों' के माध्यम से सत्ता और कुरीतियों पर प्रहार करता है, तो वह कालजयी बन जाता है। भारतेंदु मंडल ने जो नींव रखी, उसी पर आगे चलकर द्विवेदी युग का अनुशासन और छायावाद का सूक्ष्म सौंदर्य खड़ा हो सका। संक्षेप में, यह युग भारतीय अस्मिता की पहचान का प्रथम गंभीर प्रयास था। 

भारतेंदु युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं:

1. राष्ट्रीयता की भावना

इस युग के कवियों ने पहली बार देश की राजनीतिक और सामाजिक दशा पर विचार किया। जहाँ एक ओर ब्रिटिश शासन के प्रति राजभक्ति दिखाई देती थी, वहीं दूसरी ओर देश के आर्थिक शोषण के प्रति गहरी कसक भी थी। भारतेंदु जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं:
 "अँगरेज राज सुख साज सजे सब भारी, 
पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी।"

2. सामाजिक चेतना का प्रसार

साहित्यकारों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे छुआछूत, बाल-विवाह, विधवा-विवाह निषेध और अंधविश्वासों पर तीखे प्रहार किए। अब कविता केवल 'राधा-कृष्ण' के प्रेम तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह समाज सुधार का माध्यम बनी।

3. श्रृंगारिकता और रीतिवाद का प्रभाव

चूँकि यह युग रीतिकाल के ठीक बाद आया था, इसलिए पुरानी परिपाटी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। कवियों ने श्रृंगारिक रचनाएँ भी कीं और 'नख-शिख वर्णन' जैसी रीतिकालीन प्रवृत्तियाँ भी इस युग में गौण रूप से मौजूद रहीं।

4. भक्ति भावना

भारतेंदु युग में भक्ति का स्वरूप संकीर्ण नहीं था। यहाँ भक्ति के साथ-साथ देशप्रेम का संगम देखने को मिलता है। कवियों ने ईश्वर से देश की दुर्दशा सुधारने की प्रार्थना की।

5. हास्य-व्यंग्य की प्रधानता

अंग्रेजी सभ्यता की नकल, अदालती भ्रष्टाचार और सामाजिक ढोंग पर चोट करने के लिए हास्य और व्यंग्य का भरपूर सहारा लिया गया। इसके लिए 'पहेलियाँ' और 'मुकरियों' का प्रयोग किया गया।

6. समस्या-पूर्ति

यह इस युग की एक विशिष्ट काव्य पद्धति थी। गोष्ठियों में कवियों को एक पंक्ति (समस्या) दी जाती थी, जिस पर वे तत्काल कविता रचते थे। इससे कवियों की प्रतिभा और कौशल की परख होती थी।

7. भाषा का द्वैत (खड़ी बोली और ब्रजभाषा)

इस युग की सबसे बड़ी विशेषता भाषा का संक्रमण काल होना है।
 गद्य: निबंध, नाटक और उपन्यासों के लिए खड़ी बोली का प्रयोग शुरू हुआ।
 पद्य: कविता के लिए अभी भी ब्रजभाषा का ही वर्चस्व बना रहा।

भारतेंदु युग की सबसे दिलचस्प और जटिल विशेषता यही 'राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति का समन्वय' है। इसे समझने के लिए उस समय की परिस्थितियों को देखना ज़रूरी है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी इस अंतर्विरोध को रेखांकित किया है। उस समय के कवि एक अजीब कशमकश में थे।

8. राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति का 'द्वंद्व'

इस युग के कवियों ने एक ही समय में ब्रिटिश शासन की प्रशंसा भी की और उनकी नीतियों की आलोचना भी। इसके पीछे मुख्य रूप से तीन कारण थे:

शांति और व्यवस्था: मध्यकाल की अराजकता के बाद अंग्रेजों ने देश में एक व्यवस्थित शासन और कानून स्थापित किया था।
भारतेंदु युग में राजभक्ति कृतज्ञता बोध के परिणाम के रूप में सामने आई इन्होंने अंग्रेजी शासन को पूर्ववर्ती मुस्लिम शासन की और अव्यवस्था की तुलना में अधिक हितकारी माना। अंग्रेजी शासन के दौरान पश्चात संस्कृति के प्रगतिशील तत्वों का भारत में आगमन हुआ। विधि के समक्ष समानता और विधि के शासन की संकल्पना, पाश्चात्य शिक्षा और पाश्चात्य विचारधारा का आगमन,
रेल-यातायात, संचार माध्यमों तार और डाक जैसी सुविधाओं, मुद्रण संस्कृति व  प्रेस तथा पत्र पत्रिकाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार आदि के विकास के कारण कवियों को लगा कि अंग्रेजी भारत के विकास में सहायक हैं। इसीलिए उन्होंने विक्टोरिया के प्रति सम्मान प्रकट किया।

आर्थिक शोषण का अहसास: जैसे-जैसे समय बीता, इन साहित्यकारों को समझ आने लगा कि अंग्रेज भारत का धन बाहर ले जा रहे हैं। यहीं से 'राष्ट्रभक्ति' का जन्म हुआ।

दबाव और कूटनीति: उस समय सीधे तौर पर विद्रोह करना संभव नहीं था, इसलिए कवि 'राजभक्ति' का कवच पहनकर अपनी बात कहते थे।
वास्तव में, यह राजभक्ति कोई हृदय से निकली श्रद्धा नहीं थी, बल्कि एक संक्रमण काल (Transition Period) की मजबूरी और जागरूकता का मिश्रण था। भारतेंदु युग के कवियों ने ही सबसे पहले अंग्रेजों के उस मुखौटे को उतारा जिसने भारत को खोखला कर दिया था।

9. अनुवाद कार्य

हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के लिए संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला के प्रसिद्ध ग्रंथों के अनुवाद पर विशेष जोर दिया गया।

10. मुद्रण संस्कृति, पत्रकारिता और साहित्यिक संगठन

यह युग केवल कविता का नहीं, बल्कि 'पत्रकारिता' का युग था। छापाखानों के विस्तार ने साहित्य को ताड़पत्रों और महलों से निकालकर आम जनता के हाथों में पहुँचा दिया।

क.) पत्रकारिता का उदय और जनमत का निर्माण:
भारतेंदु युग के लगभग सभी साहित्यकार पत्रकार भी थे। इन पत्रिकाओं ने जनता में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाने का काम किया।

प्रमुख पत्र: भारतेंदु जी की 'कविवचनसुधा', 'हरिश्चंद्र चन्द्रिका', प्रतापनारायण मिश्र की 'ब्राह्मण', बालकृष्ण भट्ट की 'हिंदी प्रदीप' और बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' की 'आनंद कादम्बिनी'।
इन पत्रों के माध्यम से साहित्यकार जनता की समस्याओं पर सरकार से सवाल पूछते थे और समाज सुधार के विचार फैलाते थे।

ख.) भारतेंदु मंडल और साहित्यिक समूह:
भारतेंदु जी ने अपने समय के प्रतिभावान लेखकों का एक समूह तैयार किया था, जिसे 'भारतेंदु मंडल' कहा जाता है।
इसमें बालकृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, बद्रीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', ठाकुर जगमोहन सिंह और लाला श्रीनिवास दास जैसे दिग्गज शामिल थे।

ये लेखक आपस में विचार-विमर्श करते थे, जिससे साहित्य में एकरूपता और सामूहिकता आई। यह पहली बार था जब हिंदी साहित्य किसी एक व्यक्ति के बजाय एक पूरे 'आंदोलन' के रूप में आगे बढ़ रहा था।

ग.) गद्य की विविध विधाओं का विकास (समीक्षा और चिंतन):
प्रेस के आने से केवल कविता ही नहीं, बल्कि गद्य की नई विधाओं का जन्म हुआ:
समीक्षा (Criticism): पत्रिकाओं में पुस्तकों की आलोचना और समीक्षा की परंपरा शुरू हुई। बालकृष्ण भट्ट ने 'हिंदी प्रदीप' में लाला श्रीनिवास दास के नाटक 'संयोगिता स्वयंवर' की सच्ची समालोचना लिखकर हिंदी आलोचना की नींव रखी।
निबंध और चिंतन: समकालीन विषयों (जैसे- टैक्स, भुखमरी, धर्म, भाषा) पर गंभीर चिंतन और निबंध लिखे जाने लगे।

घ.) भाषा परिमार्जन और मानकीकरण:
प्रेस और प्रकाशन की मजबूरी ने लेखकों को खड़ी बोली को एक व्यवस्थित रूप देने पर मजबूर किया। पत्रिकाओं के माध्यम से ही गद्य की भाषा धीरे-धीरे परिष्कृत (Refined) होने लगी, जिसका पूर्ण विकास आगे चलकर द्विवेदी युग में हुआ।

निष्कर्ष के रूप में:

भारतेंदु युग केवल एक कालखंड नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य के इतिहास का वह 'प्रस्थान बिंदु' है जहाँ से भारतीय मनीषा ने अपनी जड़ों को पहचानते हुए आकाश की ओर देखना शुरू किया। यदि हम इस युग की प्रवृत्तियों का तार्किक विश्लेषण करें, तो हम पाते हैं कि यह काल 'विनाश' से अधिक 'सृजन' और 'पुनर्संरचना' का काल था। आचार्य शुक्ल द्वारा इसे 'प्रथम उत्थान' कहना मात्र समय का विभाजन नहीं था, बल्कि हिंदी के मानसिक धरातल के विस्तार की स्वीकारोक्ति थी।
इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने साहित्य के उद्देश्य को परिभाषित किया। रीतिकालीन कवियों के लिए साहित्य जहाँ 'रंजन' (मनोरंजन) का साधन था, वहीं भारतेंदु और उनके मंडल ने इसे 'भंजन' (बुराइयों को तोड़ने) और 'सृजन' (राष्ट्र निर्माण) का हथियार बनाया। जब हम 'समस्या-पूर्ति' या 'हास्य-व्यंग्य' की बात करते हैं, तो यह केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि तत्कालीन समाज की कुंठाओं को व्यक्त करने और औपनिवेशिक सत्ता के अहंकार को चुनौती देने का एक बौद्धिक तरीका था। भारतेंदु युग 'पुनर्जागरण' का काल था, जिसने भविष्य के साहित्य (द्विवेदी युग और छायावाद) के लिए एक ठोस आधारभूमि तैयार की। यह मध्यकाल की रूढ़ियों को तोड़कर आधुनिकता की ओर बढ़ने का पहला साहसिक कदम था जबकि मुद्रण संस्कृति ने साहित्य को 'लोकतांत्रिक' बनाया। अब साहित्य केवल 'दरबार' की संपत्ति नहीं था, बल्कि वह प्रेस के माध्यम से 'बाज़ार' और 'घर' तक पहुँच गया था। इसी कारण इस युग में 'लोक जागरण' संभव हो पाया।
तर्क के धरातल पर देखें तो मुद्रण संस्कृति (प्रेस) ने इस युग को वह पंख दिए जिसने साहित्य को 'अभिजात वर्ग' के ड्राइंग रूम से निकालकर 'आम आदमी' की चौपाल तक पहुँचाया। यह हिंदी साहित्य का प्रथम लोकतांत्रिकरण था। 'कविवचनसुधा' या 'ब्राह्मण' जैसी पत्रिकाओं ने केवल सूचनाएँ नहीं दीं, बल्कि एक ऐसी 'सार्वजनिक चेतना' (Public Consciousness) का निर्माण किया, जिसने आगे चलकर स्वाधीनता संग्राम के लिए वैचारिक जमीन तैयार की। 'भारतेंदु मंडल' कोई औपचारिक संगठन नहीं था, बल्कि यह समान विचारधारा वाले उन बुद्धिजीवियों का एक 'थिंक टैंक' था, जो भाषा और समाज दोनों को एक साथ सुधारना चाहते थे।
राजभक्ति और राष्ट्रभक्ति के जिस 'द्वंद्व' की चर्चा अक्सर की जाती है, वह वास्तव में इस युग की व्यावहारिक कूटनीति थी। कवियों ने व्यवस्था की प्रशंसा को एक कवच के रूप में इस्तेमाल किया ताकि वे आर्थिक शोषण और सामाजिक जड़ता के विरुद्ध अपनी बात कह सकें। यह उस नवजात राष्ट्रवाद की प्रक्रिया थी, जो अभी अपनी आवाज़ ढूँढ रही थी। गद्य के लिए 'खड़ी बोली' का चयन और पद्य के लिए 'ब्रज' का मोह यह विरोधाभास नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संतुलन था, जहाँ हम अतीत की मिठास को छोड़ना नहीं चाहते थे और भविष्य की तार्किकता को अपनाना हमारी मजबूरी थी।
अंततः, भारतेंदु युग का मूल्यांकन करते समय हमें यह मानना होगा कि यह युग 'संभावनाओं का युग' था। इसी युग ने वह 'कैनवास' तैयार किया जिस पर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'अनुशासन' के रंग भरे और बाद में छायावाद ने 'काल्पनिक विस्तार' दिया। मुद्रण संस्कृति के माध्यम से जिस 'लोक जागरण' का सूत्रपात हुआ, उसने हिंदी को केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय अस्मिता का पर्याय बना दिया। आज जब हम आधुनिक हिंदी साहित्य की बात करते हैं, तो भारतेंदु युग की नींव पर खड़ी वह इमारत ही दिखाई देती है, जो सदियों की गुलामी और जड़ता को चीरकर 'आत्मनिर्भर चेतना' की ओर बढ़ी थी।
यह निष्कर्ष स्पष्ट करता है कि भारतेंदु युग आधुनिकता की ओर बढ़ता हुआ वह पहला साहसिक कदम था, जिसने साहित्य को 'स्व' से ऊपर उठाकर 'सर्व' (समाज और राष्ट्र) के हित में समर्पित कर दिया।

संदर्भ ग्रंथ: 

1.शुक्ल, रामचंद्र; हिंदी साहित्य का इतिहास; नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी। (आधुनिक काल: प्रथम उत्थान के विशेष संदर्भ में)।
2.द्विवेदी, हजारीप्रसाद; हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली।
3.नगेंद्र (संपादक); हिंदी साहित्य का इतिहास; मयूर पेपरबैक्स, नोएडा।
4.चतुर्वेदी, रामस्वरूप; हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास; लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद।
5.शर्मा, रामविलास; भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएँ; राजकमल प्रकाशन

अस्वीकरण (Disclaimer)

प्रस्तुत आलेख 'हिंदी साहित्य का आधुनिक काल: भारतेंदु युग' वेब पत्रिका 'मीमांसा' के पाठकों के ज्ञानवर्धन और अकादमिक विमर्श के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। इस लेख में व्यक्त विचार शोधपरक और तार्किक विश्लेषण पर आधारित हैं, जिनका उद्देश्य हिंदी साहित्य के मौलिक चिंतन को बढ़ावा देना है। यद्यपि सामग्री की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल एवं अन्य मानक इतिहासकारों के संदर्भों का उपयोग किया गया है, तथापि साहित्य के विभिन्न मतों में भिन्नता संभव है। लेख का उद्देश्य किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व, संस्था या विचारधारा की गरिमा को ठेस पहुँचाना नहीं है।

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