मनोज मुर्मू की कविता - सरकारी । जोहार स्तंभ। वेब पत्रिका 'मीमांसा'।

प्रकृति और मनुष्य का रिश्ता जब 'मालिकाना हक' की भेंट चढ़ जाता है, तो जन्म लेती है छटपटाहट। मनोज मुर्मू की कविता 'सरकारी' इसी छटपटाहट का दस्तावेज है। यह कविता उस विडंबना को उजागर करती है जहाँ एक तरफ आदिवासी समाज के लिए 'जल, जंगल और जमीन' उनकी पहचान और अस्तित्व के पर्याय हैं, वहीं दूसरी तरफ सत्ता और व्यवस्था के लिए ये केवल 'संसाधन' मात्र हैं।

जब विकास की मशीनें केवल जमीन ही नहीं, बल्कि मनुष्य की 'नींद' और 'सपनों' को भी नापने लगें, तब लोकतंत्र के दावों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। यह कविता हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या वास्तव में हमारे सपने भी अब हमारे अपने नहीं रहे? 'जोहार' स्तंभ में आज पढ़िए, व्यवस्था के क्रूर हस्तक्षेप और छीन ली गई पहचान की यह मर्मस्पर्शी रचना।

एक दिन
हमसे पूछा गया-
तुम्हारे पास क्या है?
हमने कहा-
हमारी पहचान
हमारी अस्तित्व
जल जंगल और जमीन।
उन्होंने मुस्कराकर कहा-
यही तो हम लेना चाहते हैं..
फिर एक रात
वे मशीनें लेकर आए,
और नापने लगे
हमारी नींद।
हम सोते रहे,
और सुबह उठे
तो जाना-
हमारे सपने भी
अब सरकारी हो चुके हैं।

-मनोज मुर्मू


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