पाश्चात्य साहित्य शास्त्र
यूजीसी नेट/जेआरएफ हिंदी (इकाई-3: साहित्यशास्त्र / पाश्चात्य काव्यशास्त्र) के अंतर्गत आने वाले इन सभी आचार्यों, सिद्धांतों, अवधारणाओं और काव्य-शिल्पों का प्रामाणिक, व्यवस्थित और परीक्षा-केंद्रित अध्ययन विवरण:
### 1. प्लेटो (Plato: 427–347 ई.पू., यूनान)
* **प्रमुख ग्रंथ:** *द रिपब्लिक* (The Republic), *इयोन* (Ion), *सिम्पोजियम* (Symposium), *फीड्रस* (Phaedrus), *द लॉज* (The Laws)। प्लेटो के ग्रंथ संवाद (Dialogue) शैली में लिखे गए हैं, जिनमें मुख्य वक्ता 'सुकरात' हैं।
* **दार्शनिक आधार (प्रत्ययवाद / Idealism):** जगत दो हैं—'विचार जगत' (World of Ideas) और 'भौतिक जगत' (Physical World)। परम सत्य केवल 'विचार' (प्रत्यय) है, जो अपरिवर्तनशील और ईश्वरीय है। यह दृश्यमान भौतिक संसार उस विचार की छाया (नकल) है।
* **काव्य-सिद्धांत (अनुकरण का अनुकरण):**
* कविता भौतिक जगत का अनुकरण करती है, और भौतिक जगत स्वयं ईश्वरीय विचार का अनुकरण है।
* अतः कला/काव्य **"सत्य से दुगुनी दूर"** (Twice removed from reality) है।
* *उदाहरण:* ईश्वर ने पलंग का मूल विचार (प्रत्यय) रचा \rightarrow बढ़ई ने उसे देखकर लकड़ी का पलंग बनाया \rightarrow चित्रकार या कवि ने उस पलंग का चित्र या वर्णन किया। इसलिए कवि छाया की छाया (अनुकरण का अनुकरण) रचता है।
* **काव्य-प्रेरणा (दैवी उन्माद / Divine Madness):** *इयोन* संवाद में प्लेटो ने कहा कि कवि सचेत या तर्कशील होकर नहीं लिखता, बल्कि जब उस पर 'दैवी उन्माद' सवार होता है, तभी वह रचना कर पाता है।
* **कवियों का आदर्श गणराज्य से निष्कासन:** प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य (*Republic*) से कवियों को बाहर निकालने की वकालत की, जिसके दो मुख्य आधार थे:
1. *दार्शनिक आधार:* काव्य असत्य और अवास्तविक है।
2. *नैतिक/सामाजिक आधार:* काव्य मनुष्य की तर्कबुद्धि को दबाकर वासनाओं, अश्रुपात और दुर्बल भावों को भड़काता है, जिससे नागरिक अकर्मण्य बनते हैं।
### 2. अरस्तू (Aristotle: 384–322 ई.पू., यूनान)
* **प्रमुख ग्रंथ:** *पेरी पोइएतिकेस* (Poetics / काव्यशास्त्र), *रेतोरिके* (Rhetoric / भाषणशास्त्र)।
* **गुरु-शिष्य परंपरा:** सुकरात \rightarrow प्लेटो \rightarrow अरस्तू \rightarrow सिकंदर।
**क. अनुकरण सिद्धांत (Theory of Mimesis)**
* अरस्तू ने प्लेटो के 'अनुकरण' को हीन मानने के विचार को उलट दिया। अरस्तू के अनुसार अनुकरण अंधी नकल (Photographic copy) नहीं, बल्कि **"पुनर्सृजन" (Re-creation / Creative reproduction)** है।
* कवि प्रकृति का अनुकरण तीन रूपों में करता है:
1. जैसी चीजें थीं या हैं (यथार्थपरक रूप)।
2. जैसी कही या समझी जाती हैं (प्रतीतिपरक रूप)।
3. जैसी वे होनी चाहिए (आदर्श रूप / संभाविता का नियम)।
* *महत्वपूर्ण सूत्र:* इतिहास और कविता की तुलना करते हुए अरस्तू ने कहा—"इतिहासकार बताता है कि क्या घटित हुआ है, जबकि कवि बताता है कि क्या घटित हो सकता है (संभाव्य)। इसलिए काव्य, इतिहास की तुलना में अधिक दार्शनिक और सार्वभौमिक है।"
**ख. त्रासदी विवेचन (Theory of Tragedy)**
* *परिभाषा:* "त्रासदी किसी गंभीर, स्वतःपूर्ण और निश्चित आयाम से युक्त कार्य का अनुकरण है, जो भाषा के विविध अलंकारों से सज्जित हो, जो आख्यान रूप में न होकर कार्य-व्यापार के रूप में प्रस्तुत की जाए और करुणा (Pity) तथा भय (Fear) के उद्रेक द्वारा इन भावों का उचित विरेचन करे।"
* **त्रासदी के 6 अनिवार्य अंग (क्रमशः वरीयता के आधार पर):**
1. कथानक (Mythos / Plot) — इसे त्रासदी की 'आत्मा' कहा गया है।
2. चरित्र (Ethos / Character)
3. विचार (Dianoia / Thought)
4. पद-योजना / भाषा (Lexis / Diction)
5. गीत / संगीत (Melos / Song)
6. दृश्य-विधान (Opsis / Spectacle)
* **त्रासदी से जुड़े प्रमुख तकनीकी शब्द:**
* **हामर्शिया (Hamartia):** नायक की निर्णयगत भूल या त्रुटि (Tragic Flaw), जिसके कारण उसका उत्थान से पतन होता है (यह कोई नैतिक पाप या दुष्टता नहीं, बल्कि भूल है)।
* **पेरिपेतीया (Peripeteia):** स्थिति या भाग्य का अचानक उलट जाना (Reversal of fortune)।
* **एनाग्नोरिसिस (Anagnorisis):** अज्ञान से ज्ञान की ओर संक्रमण या वास्तविक पहचान (Recognition)।
* **ह्युब्रिस (Hubris):** अत्यधिक अभिमान या दुस्साहस जो पतन की ओर ले जाता है।
**ग. विरेचन सिद्धांत (Theory of Catharsis)**
* यह शब्द यूनानी चिकित्साशास्त्र (Medicine) से लिया गया है, जिसका अर्थ है—उदर की शुद्धि (बाह्य पदार्थों का निष्कासन)।
* अरस्तू ने इसे मानसिक और भावात्मक धरातल पर प्रयुक्त किया। त्रासदी रंगमंच पर **करुणा (Pity)** और **भय (Fear)** के संवेगों को उभारती है और अंततः उनका परिशोधन या शमन करके दर्शक के मन को शांत, संतुलित और आनंदित करती है।
* *व्याख्याकारों के तीन मुख्य दृष्टिकोण:*
* *चिकित्सापरक अर्थ:* बर्निस (Bernays) के अनुसार—उद्वेगकारी अतिरिक्त भावों का निष्कासन।
* *नीतिपरक अर्थ:* गेटे (Goethe) और अन्य के अनुसार—अतिवादी भावों का संतुलन और नैतिक शुद्धि।
* *कलापरक अर्थ:* बुचर (Butcher) के अनुसार—दर्दनाक अनुभवों का भी कलात्मक आनंद में रूपांतरण।
### 3. विलियम वर्ड्सवर्थ (William Wordsworth: 1770–1850)
* **स्वच्छंदतावाद (Romanticism) के प्रवर्तक:** 1798 में कॉलरिज के साथ मिलकर *लिरिकल बैलाड्स* (Lyrical Ballads) का प्रकाशन किया। 1800 के द्वितीय संस्करण में वर्ड्सवर्थ ने प्रसिद्ध 'प्रिफेस' (Preface) जोड़ा।
* **काव्य की परिभाषा:** "कविता प्रबल अनुभूतियों का सहज उच्छलन है, जिसका उद्भव शांत वातावरण में याद किए गए संवेगों से होता है" (*Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquillity*)।
* **काव्यभाषा सिद्धांत के केंद्रीय बिंदु:**
1. कविता की भाषा ग्रामीणों और जनसाधारण की वास्तविक बोलचाल की भाषा होनी चाहिए।
2. गद्य और पद्य (काव्य) की भाषा में कोई तात्विक भेद नहीं है (*There neither is, nor can be, any essential difference between the language of prose and metrical composition*)।
3. कृत्रिम, अलंकरण-युक्त नव-अभिजात्यवादी (Neo-classical) 'काव्यात्मक शब्दावली' (Poetic Diction) का उन्होंने तीव्र विरोध किया।
4. *सीमा/त्रुटि:* कॉलरिज ने आगे चलकर वर्ड्सवर्थ की इस बात का खंडन किया कि गद्य और पद्य की भाषा समान होती है; क्योंकि छंद (Metre) के प्रयोग से भाषा में विशिष्ट व्यवस्था और संगीत आ जाता है।
### 4. सैमुअल टेलर कॉलरिज (S.T. Coleridge: 1772–1834)
* **प्रमुख ग्रंथ:** *बायोग्राफिया लिटरेरिया* (Biographia Literaria, 1817)।
* **कल्पना और फैंटेसी (Imagination and Fancy) का वर्गीकरण:**
कॉलरिज ने कल्पना को दो स्तरों पर और फैंटेसी को उससे पृथक कोटि में वर्गीकृत किया:
**1. मुख्य कल्पना (Primary Imagination):**
* यह समस्त मानवीय प्रत्यक्षीकरण (Perception) की जीवंत शक्ति है।
* यह सभी मनुष्यों में जन्मजात होती है और अनजाने में सक्रिय रहती है।
* इसका कार्य बाह्य जगत की संवेदनाओं को ग्रहण करके मन में बिंब बनाना है।
**2. गौण कल्पना (Secondary Imagination):**
* यह मुख्य कल्पना की ही प्रतिध्वनि है, किंतु यह सचेत, ऐच्छिक और केवल 'कलाकारों/कवियों' में पाई जाती है।
* यह विरोधी तत्वों को पिघलाती है, विखंडित करती है और नए सिरे से एकीकृत करती है (Dissolves, diffuses, dissipates, in order to recreate)। इसे **सह-संयोजक शक्ति (Esemplastic power)** कहा गया।
**3. फैंटेसी / ललित कल्पना (Fancy):**
* कॉलरिज के अनुसार फैंटेसी कल्पना से निम्न स्तर की है।
* यह कोई नई सृष्टि नहीं करती; यह केवल स्मृति (Memory) का एक रूप है, जो देश-काल के बंधनों से बंधी मृत वस्तुओं और आकारों को यांत्रिक ढंग से जोड़ती है।
* *संक्षिप्त अंतर:* कल्पना 'रासायनिक सम्मिश्रण' (नया तत्व बनाना) है, जबकि फैंटेसी केवल 'भौतिक यांत्रिक जोड़' (Mechanic mixture) है।
* **विलिंग सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ (Willing suspension of disbelief):**
* पाठक या दर्शक जब किसी काल्पनिक/अलौकिक काव्य को पढ़ता है, तो वह क्षण भर के लिए अपने अविश्वास को स्वेच्छा से स्थगित कर देता है ताकि काव्यानंद ले सके।
### 5. टी. एस. इलिएट (T.S. Eliot: 1888–1965)
* **प्रमुख ग्रंथ/निबंध:** *ट्रेडिशन एंड द इंडिविजुअल टैलेंट* (1919), *द सेक्रेड वुड* (1920), *द यूज ऑफ पोएट्री एंड द यूज ऑफ क्रिटिसिज्म* (1933)। 1948 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार।
**क. परंपरा की अवधारणा (Concept of Tradition)**
* परंपरा मरी हुई पुरानी वस्तुओं को ढोना या अंधानुकरण नहीं है।
* परंपरा को अर्जित करने के लिए 'ऐतिहासिक बोध' (Historical sense) की आवश्यकता होती है। ऐतिहासिक बोध का अर्थ है—केवल अतीत के अतीतत्व का नहीं, बल्कि उसके वर्तमानत्व का बोध होना।
* जब कोई नया मौलिक कलाकार कोई महान कृति रचता है, तो परंपरा का क्रम अपरिवर्तित नहीं रहता; नए के आने से पूरी परंपरा की व्यवस्था में सूक्ष्म फेरबदल हो जाता है।
**ख. निर्वैयक्तिकता का सिद्धांत (Theory of Impersonality)**
* "कविता संवेगों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि संवेगों से मुक्ति है; वह व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व से पलायन है" (*Poetry is not a turning loose of emotion, but an escape from emotion; it is not the expression of personality, but an escape from personality*)।
* कवि का मन एक माध्यम (Catalyst/उत्प्रेरक) मात्र है।
* **प्लैटिनम के तार का सादृश्य (Chemical Analogy):** जब सल्फर डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन के मिश्रण में प्लैटिनम का बारीक तार डाला जाता है, तो सल्फ्यूरिक एसिड बनता है। इस प्रक्रिया में प्लैटिनम का तार स्वयं अपरिवर्तित रहता है और नए बने अम्ल में प्लैटिनम का कोई निशान नहीं छूटता। इसी तरह कवि का मन केवल उत्प्रेरक है, उसकी निजी भावनाएं रचना में सीधे नहीं आनी चाहिए।
**ग. वस्तुनिष्ठ प्रतिरूपक (Objective Correlative)**
* *निबंध:* *हैमलेट एंड हिज प्रॉब्लम्स* (1919)।
* कला में किसी भाव की अभिव्यक्ति सीधे न करके वस्तुओं के समुच्चय, स्थिति और घटनाओं की ऐसी श्रृंखला के माध्यम से की जानी चाहिए, जो उस भाव को पाठक के भीतर स्वतः जगा सके। इलिएट ने शेक्सपियर के नाटक *हैमलेट* को कलात्मक रूप से असफल माना क्योंकि हैमलेट की मनोव्यथा के लिए समुचित 'वस्तुनिष्ठ प्रतिरूपक' नहीं गढ़ा गया था।
**घ. संवेदनशीलता का पृथक्करण (Dissociation of Sensibility)**
* 17वीं सदी के बाद (मिल्टन और ड्राइडन के समय) विचार और भाव एक-दूसरे से अलग हो गए (बौद्धिक चिंतन अलग, संवेदनात्मक अनुभूति अलग)। इलिएट ने जॉन डन जैसे मेटाफिजिकल कवियों की प्रशंसा की क्योंकि उनके यहाँ "विचार ही संवेदना बन जाते थे" (Unification of sensibility)।
### 6. आई. ए. रिचर्ड्स (I.A. Richards: 1893–1979)
* **प्रमुख ग्रंथ:** *द मीनिंग ऑफ मीनिंग* (1923 - सी.के. ऑगडेन के साथ), *प्रिंसिपल्स ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिज्म* (1924), *साइंस एंड पोएट्री* (1926), *प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म* (1929)।
**क. मूल्य सिद्धांत (Theory of Value)**
* रिचर्ड्स ने सौंदर्यशास्त्र को मनोविज्ञान पर आधारित किया।
* मनुष्य का मन अनेक प्रवृत्तियों, वासनाओं और आवेगों (Appetencies) से बना है।
* 'मूल्य' वह है जो किसी अन्य आवेग को दबाए या कुंठित किए बिना अधिक से अधिक मानवीय आवेगों को संतुष्ट करे।
* कविता विभिन्न और परस्पर विरोधी आवेगों में **संतुलन और समरसता (Synaesthesis)** स्थापित करती है, इसलिए कविता उच्चतम मानवीय मूल्य है।
**ख. संप्रेषण सिद्धांत (Theory of Communication)**
* संप्रेषण कोई जादुई या रहस्यमयी क्रिया नहीं है; यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कवि की अनुभूति पाठक तक उसी रूप में संचरित होती है।
* संप्रेषण की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कवि और पाठक के अनुभवों व मानसिक स्थितियों में कितनी समानता और सामंजस्य है।
**ग. काव्य-भाषा सिद्धांत (वैचारिक बनाम संवेगात्मक भाषा)**
रिचर्ड्स ने भाषा के दो स्पष्ट प्रयोग बताए:
1. **वैज्ञानिक / तथ्यात्मक प्रयोग (Referential / Scientific use):** जहाँ शब्द केवल अपने वस्तुपरक अर्थ (तथ्य) की ओर संकेत करता है (सत्य/असत्य की कसौटी लागू होती है)।
2. **रागात्मक / काव्यात्मक प्रयोग (Emotive use):** जहाँ शब्द का उद्देश्य तथ्य बताना नहीं, बल्कि मन में विशिष्ट राग, संवेग और भाव जगाना होता है (यहाँ सत्य/असत्य लागू नहीं होता)।
* **स्यूडो-स्टेटमेंट (आभासी कथन):** काव्य-कथन वैज्ञानिक सत्य नहीं होते, वे 'छद्म-कथन' या आभासी कथन होते हैं, जिनका उद्देश्य केवल संवेगों को संतुष्ट और संतुलित करना है।
### 7. रूसी रूपवाद (Russian Formalism)
* **उद्भव व काल:** 1915–1930 के दौरान रूस में।
* **दो प्रमुख केंद्र / संगठन:**
1. *मॉस्को लिंग्विस्टिक सर्कल* (1915): प्रमुख व्यक्ति—रोमन जैकोबसन (Roman Jakobson)।
2. *ओपोजाज (OPOJAZ - काव्य भाषा अध्ययन समिति, सेंट पीटर्सबर्ग, 1916):* प्रमुख व्यक्ति—विक्टर श्क्लोव्स्की, बोरिस आइखेनबॉम, यूरी तिनियानोव।
* **मूल स्थापनाएं:**
* साहित्य के ऐतिहासिक, सामाजिक या मनोवैज्ञानिक संदर्भ को त्यागकर उसकी आंतरिक संरचना, भाषा और **रूप (Form)** पर ध्यान केंद्रित करना।
* **साहित्यिकता (Literariness):** रोमन जैकोबसन ने कहा—"साहित्यिक समीक्षा का विषय साहित्य नहीं, बल्कि 'साहित्यिकता' है, यानी वह विशिष्ट तत्व जो किसी सामान्य भाषिक रचना को साहित्य बनाता है।"
* **अजनबीकरण / विलक्षणता (Defamiliarization / Ostranenie):**
* विक्टर श्क्लोव्स्की का प्रसिद्ध निबंध—*आर्ट ऐज डिवाइस* (Art as Technique, 1917)।
* दैनिक जीवन की आदतें हमारी संवेदनाओं को कुंद कर देती हैं। कला का काम है परिचित चीजों को अपरिचित, नया और विलक्षण बनाकर प्रस्तुत करना ताकि पाठक उन्हें नए सिरे से महसूस कर सके।
* **फब्युला (Fabula) बनाम सुजेत (Syuzhet):**
* *फब्युला:* कच्ची कथावस्तु, घटनाओं का स्वाभाविक कालानुक्रम (Chronological raw story)।
* *सुजेत:* कथानक, कथा को कलात्मक रूप से पुनर्व्यवस्थित करना (Artistic plot)।
### 8. नयी समीक्षा (New Criticism)
* **उद्भव:** 1930 से 1950 के दशक के बीच अमेरिका और ब्रिटेन में।
* **नामकरण:** जॉन क्रो रैनसम (John Crowe Ransom) की पुस्तक *द न्यू क्रिटिसिज्म* (1941) से इस आंदोलन का नाम पड़ा।
* **प्रमुख समीक्षक:** जॉन क्रो रैनसम, एलन टेट, क्लींथ ब्रुक्स, रॉबर्ट पेन वॉरेन, विमसेट और बियर्ड्सले, आई.ए. रिचर्ड्स व टी.एस. इलिएट (प्रेरणा-स्रोत)।
* **केंद्रीय सिद्धांत (पाठ-केंद्रित समीक्षा / Close Reading):**
* "पाठ ही सब कुछ है" (Text in itself)। लेखक की जीवनी, इतिहास, राजनीति और समाजशास्त्र को समीक्षा से बाहर रखना (Ontological criticism)।
* **प्रमुख अवधारणाएं ও पारिभाषिक शब्द:**
* **साशयता का भ्रम (Intentional Fallacy):** (विमसेट एवं बियर्ड्सले) कृति का मूल्यांकन लेखक के निजी इरादे या उद्देश्य के आधार पर करना एक गंभीर भ्रम है।
* **प्रभाववादी भ्रम (Affective Fallacy):** (विमसेट एवं बियर्ड्सले) कृति का मूल्यांकन इस आधार पर करना कि पाठक पर उसका क्या मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा, समीक्षा का दूसरा बड़ा दोष है।
* **विडंबना (Irony):** संदर्भ के बदलने से उत्पन्न अर्थ-विरोध (क्लींथ ब्रुक्स, रॉबर्ट पेन वॉरेन)।
* **व्याघात / विरोधाभास (Paradox):** क्लींथ ब्रुक्स की पुस्तक *द वेल रॉट अर्न* (The Well Wrought Urn)। ब्रुक्स के अनुसार "कविता की भाषा विरोधाभास की भाषा है।"
* **तनाव (Tension):** एलन टेट की अवधारणा। कविता का अर्थ उसके शाब्दिक/वाच्यार्थी प्रसार (Extension) और लाक्षणिक/गूढ़ार्थ (Intension) के बीच का संतुलन या खिंचाव (Tension) है।
* **गठीलापन / संरचना और बुनावट (Structure and Texture):** जॉन क्रो रैनसम के अनुसार 'संरचना' तर्कसंगत ढांचा है और 'बुनावट' उसका काव्यात्मक विवरण (अलंकार, बिंब)।
### 9. प्रमुख शिल्पगत उपकरण एवं अवधारणाएं
**क. मिथक (Myth)**
* **मूल:** यूनानी शब्द *माइथोस* (Mythos) से व्युत्पन्न, जिसका अर्थ है—कथा, वृत्तांत या वचन।
* **स्वरूप:** किसी आदिम समाज या संस्कृति द्वारा प्रकृति, अलौकिक शक्तियों, जीवन-मृत्यु और ब्रह्मांडीय रहस्यों को समझने के लिए रची गई सामूहिक विश्वास-कथाएं।
* **महत्व:** आधुनिक साहित्य में मिथक का प्रयोग अतीत के संदर्भ से वर्तमान जीवन की विसंगतियों को समझने और अर्थ देने के लिए किया जाता है (जैसे—धर्मवीर भारती का *अंधा युग*, कुंवर नारायण का *आत्मजयी*, दिनकर का *रश्मिरथी*)।
* कार्ल गुस्ताव युंग ने मिथकों को 'सामूहिक अचेतन' (Collective Unconscious) का प्रकटीकरण माना।
**ख. फैंटेसी (Phantasy / Fantasy)**
* **मूल:** ग्रीक शब्द *फैंटेशिया* (Phantasia), जिसका अर्थ है—मानसिक प्रतीति या कल्पना का दृश्य।
* **स्वरूप:** यथार्थ के नियमों (भौतिकी, तर्क, काल) को तोड़कर रची गई अति-काल्पनिक, स्वप्निल, तिलस्मी या विद्रूप संरचना।
* **साहित्यिक प्रयोग:** यह पलायन नहीं, बल्कि जटिल यथार्थ को व्यक्त करने का औजार है।
* हिंदी में मुक्तिबोध ने फैंटेसी का सबसे गहरा प्रयोग किया (*अंधेरे में*)। मुक्तिबोध के अनुसार फैंटेसी अंतःकरण के दमित संघर्षों और सामाजिक विद्रूपताओं को उभारने वाली 'ज्ञानात्मक संवेदन' की संरचना है।
**ग. कल्पना (Imagination)**
* **स्वरूप:** अनुपस्थित या अदृश्य वस्तुओं, विचारों और अनुभूतियों को मानसिक धरातल पर प्रत्यक्ष और साकार करने की सृजनात्मक शक्ति।
* **पाश्चात्य दृष्टि:** कॉलरिज ने इसे विरोधी तत्वों को जोड़कर एक नई सजीव इकाई रचने वाली आत्मिक शक्ति माना।
* **भारतीय दृष्टि:** आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कल्पना के दो भेद किए:
1. *विधायक / सर्जक कल्पना:* जो कवि में होती है और नई रचना गढ़ती है।
2. *ग्राहक कल्पना:* जो पाठक/श्रोता में होती है, जिससे वह कवि के भावों को ग्रहण करता है।
**घ. प्रतीक (Symbol)**
* **मूल:** ग्रीक शब्द *सिम्बॉलन* (Symbolon) से, जिसका अर्थ है—पहचान-चिह्न।
* **स्वरूप:** जब कोई मूर्त (दिखाई देने वाली) वस्तु, शब्द या आकृति किसी अमूर्त विचार, भाव या अर्थ का प्रतिनिधित्व करने लगे।
* **विशेषता:** प्रतीक का एक वाच्यार्थ होता है और दूसरा गहरा व्यंग्यार्थ।
* *उदाहरण:* 'कमल' शुचिता/सौंदर्य का, 'गुलाब' प्रेम का, 'हंस' विशुद्ध आत्मा का प्रतीक है। आधुनिक हिंदी साहित्य में 'कामायनी' के पात्र प्रतीकात्मक हैं: मनु (मन), श्रद्धा (हृदय/रागात्मिका वृत्ति), इड़ा (तर्क/बुद्धि)।
**ङ. बिम्ब (Image)**
* **मूल:** लैटिन शब्द *इमागो* (Imago) से।
* **स्वरूप:** शब्दों के माध्यम से पाठक के मन पर किसी वस्तु, दृश्य या अनुभूति का ऐंद्रिक (Sensory) चित्र उभारना। सी. डे. लुईस के अनुसार—"बिम्ब कविता में प्रयुक्त वह शब्द-चित्र है जो हमारी इंद्रियों को छूता है।"
* **इंद्रिय-संवेदन के आधार पर बिम्ब के 5 मुख्य भेद:**
1. *चाक्षुष बिम्ब (Visual):* जो आंखों के सामने रूप-रंग का चित्र उभारे (उदा. "दूर तक फैली हरी दूब पर ओस की चमक")।
2. *श्रव्य बिम्ब (Auditory):* जो कानों में ध्वनि का अहसास जगाए (उदा. "झरने का कल-कल निनाद", "घोड़ों की टापों की आवाज")।
3. *स्पर्श बिम्ब (Tactile):* जो त्वचा पर छुअन महसूस कराए (उदा. "शिशु की मखमली कोमल हथेलियां")।
4. *घ्राण बिम्ब (Olfactory):* जो गंध/महक का भान कराए (उदा. "मिट्टी पर पहली बारिश की सौंधी सुगंध")।
5. *स्वाद्य बिम्ब (Gustatory):* जो स्वाद की अनुभूति जगाए (उदा. "कच्चे आम का तीखा-खट्टा स्वाद")।
### यूजीसी नेट/जेआरएफ त्वरित पुनरावलोकन सारणी
| सिद्धांत / अवधारणा | प्रवर्तक / आचार्य | केंद्रीय पुस्तक / वर्ष | मूल पारिभाषिक शब्दावली / सूत्र |
|---|---|---|---|
| **काव्य-अनुकरण / प्रत्यय** | प्लेटो | *द रिपब्लिक* | सत्य से दुगुनी दूर, छाया की छाया, दैवी उन्माद |
| **अनुकरण / त्रासदी / विरेचन** | अरस्तू | *पोएटिक्स* | हामर्शिया, पेरिपेतीया, एनाग्नोरिसिस, कैथार्सिस, संभाव्यता |
| **काव्यभाषा सिद्धान्त** | वर्ड्सवर्थ | *लिरिकल बैलाड्स* (1798/1800) | शांत वातावरण में संवेगों का स्मरण, कृत्रिम शब्दावली का विरोध |
| **कल्पना और फैंटेसी** | कॉलरिज | *बायोग्राफिया लिटरेरिया* (1817) | प्राथमिक/गौण कल्पना, विलिंग सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ |
| **निर्वैयक्तिकता / परम्परा** | टी.एस. इलिएट | *द सेक्रेड वुड* (1919/1920) | उत्प्रेरक (प्लैटिनम तार), वस्तुनिष्ठ प्रतिरूपक, संवेदनशीलता-पृथक्करण |
| **मूल्य / संप्रेषण / भाषा** | आई.ए. रिचर्ड्स | *प्रिंसिपल्स ऑफ लिट. क्रिटिसिज्म* | आवेगों का संतुलन, स्यूडो-स्टेटमेंट, रागात्मक भाषा |
| **रूसी रूपवाद** | श्क्लोव्स्की, जैकोबसन | *आर्ट ऐज डिवाइस* (1917) | अजनबीकरण (Defamiliarization), साहित्यिकता, फब्युला/सुजेत |
| **नयी समीक्षा** | जॉन क्रो रैनसम, क्लींथ ब्रुक्स | *द न्यू क्रिटिसिज्म* (1941) | साशयता का भ्रम, प्रभाववादी भ्रम, विडंबना, विरोधाभास, तनाव |
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